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Showing posts from May, 2020

हमारे गांवों का पुनर्निर्माण, अध्याय-3 भाग-1 गांवों की सफाई

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अध्याय-3 भाग-1 गांवों की सफाई   गाँवों में करने के कार्य ये है कि उनमें जहाँ-जहाँ कुड़े-कर्कट तथा गोबर के ढेर हो, वहाँ-वहाँ से उनको हटाया जाय और कुओं तथा तालाबों की सफाई की जाय । अगर कार्यकर्ता लोग नौकर रखें हुए भंगियों की भांति खुद रोज सफाई का काम करना शुरू कर दें और साथ ही गाँव वालों को यह भी बतलाते रहें कि उनसे सफाई के कार्य में शरीक होने की आशा रखी जाती है,ताकि आगे चलकर अंत में सारा काम गाँव वाले स्वयं करने लग जायं, तो यह निश्चित है की आगे या पीछे गाँव वाले इस कार्य में अवश्य सहयोग देने लगेंगे । वहाँ के बाजार तथा गलियों को सब प्रकार का कूड़ा-कर्कट हटाकर स्वच्छ बना लेना चाहिए । उसमें से कुछ का तो खाद बनाया जा सकता है, कुछ को सिर्फ जमीन में गाड़ देना भर बस होगा और कुछ हिस्सा ऐसा होगा कि जो सीधा संपती के रूप में परिणत किया जा सकेगा । वहाँ मिली हुई प्रत्येक हड्डी एक बहुमूल्य कच्चा माल होगी, जिससे बहुत सी उपयोगी चीजें बनाई जा सकेंगी, या जिसे पीसकर कीमती खाद बनाया जा सकता है और इधर-उधर से इकट्ठा किया हुआ मल-मूत्र गाँव के खेतों के लिए स्वर्णमय खाद का काम देगा । मल-मूत्र को उपय...

हमारे गांवों का पुनर्निर्माण , अध्याय 2 भाग – 3 समग्र-ग्राम-विकास

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अध्याय 2 भाग – 3 समग्र-ग्राम-विकास देहात वालों में वह कला और कारीगरी होनी चाहिए, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत की जा सके । जब गांवों का पूरा-पूरा विकास हो जाएगा, तो देहातियों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरी के धनी स्त्री-पुरुषों की कमी गांवों में नहीं रहेगी । गांवों में कवि होंगे,चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के पंडित होंगे और खोज करने वाले लोग भी होंगे । थोड़े में, जिंदगी की ऐसी कोई छीजी न होगी जो गांवों में न मिले । आज हमारे गाँव उजड़े हुए है और कुड़े-कचरे के ढेर बने हुए हैं । कल वहीं सुंदर बगीचे होंगे और ग्राम वासियों को ठगना या उनका शोषण करना नामुमकिन हो जायगा । इस तरह की गांवों की पुनर्रचना का काम आज से ही शुरू हो जाना चाहिए । गांवों की पुनर्रचना का काम कामचलाऊ नहीं, बल्कि स्थायी होना चाहिए । उद्योग,हुनर,तंदरुस्ती और शिक्षा इन चारों का सुंदर समन्वय करना चाहिए । नई तालिम उद्योग और शिक्षा, तंदरुस्ती और हुनर का सुंदर समन्वय है । इन सब के मेल से माँ के पेट में आने के समय से लेकर बुढ़ापे तक का एक खूबसूरत फूल तैयार होता है । यही नयी तालिम है । इस...

हमारे गांवों का पुनर्निर्माण, अध्याय-2, भाग-2 - ग्राम-स्वराज्य

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अध्याय 2 भाग –2,   ग्राम-स्वराज्य   ग्राम स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातन्त्र होगा,जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा ; और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए – जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा- वह परस्पर सहयोग से काम लेगा । इस तरह हर एक गाँव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले ।उसके पास इतनी फाजिल जमीन होनी चाहिए, जिसमें ढोंर चर सकें और गाँव के बड़ों एवं बच्चों के लिए मन बहलाव के साधन एवं खेलकुद के मैदान का बंदोबस्त हो सके। इसके बाद भी जमीन बची, तो वह उसमें ऐसी उपयोगीं चीजें बोएगा, जिन्हें बेचकर वह आर्थिक लाभ उठा सकें; यों वह गांजा, तंबाकू,अफीम,वगैरह की खेती से बचेगा । हर एक गाँव में गाँव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा-भवन रहेगा । पानी के लिए उसका अपना अलग इंतजाम होगा – वाटरवर्क्स होगा, जिससे सभी गाँव वालों को शुद्ध पानी मिला करेगा । कुओं और तालाबों पर गाँव का नियंत्रण रखकर काम किया जा सकता है । बुनियादी तालिम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगी । जह...

महामना मदन मोहन मालवीय जी अपने नाम में मालवीय कैसे लिखते थे ?

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महामना मदन मोहन मालवीय जी अपने नाम में मालवीय कैसे लिखते थे ? काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महान पंडित मदन मोहन मालवीय जी थे । इनका गोत्र तो भरद्वाज था, और चतुर्वेदी इनका आस्पद था । इनके पितामह थे पंडित प्रेमधर जी चतुर्वेदी और इनके पिता जी का नाम था पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी । माता जी का नाम था मूना देवी । मालवीय जी के पितामह एवं पिताजी अपने को चतुर्वेदी लिखते और कहते रहे । फिर क्यों श्री मदनमोहन मालवीय जी अपने को भरद्वाज गोत्रीय चतुर्वेदी न लिखकर “मालवीय” लिखना शुरू किए ? और इसी नाम से वे जग जाहीर हुए । ‘मालवीय’ का अर्थ है ‘मालवा का’ यानि की मालवा का रहने वाला । किसी समय (1449) में मलवीय जी के पूर्वज मुसलमान शासकों के अत्याचार से पीड़ित होकर मालवा को छोड़कर उतर प्रदेश के नगरों में बस गए – कुछ लखनऊ में, कुछ मिर्जापुर में और कुछ प्रयाग में आकर बसे। मालवीय जी के पुरखे प्रयाग में बसे और अपने को चतुर्वेदी कहकर प्रसिद्ध किया । इस रहस्य का एक कारण मालूम होता है । मालवीय जी यह नही चाहते थे की उत्तर प्रदेश में रहने के कारण लोग उन्हें ‘मथुरा के चौबे’ समझ लें । मालवीय जी इस बात की चिंत...

हमारे गाँवों का पुनर्निर्माण भाग-1 गांवों का स्थान

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हमारे गाँवों का पुनर्निर्माण अध्याय -1 गांवों का स्थान गांवों की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज्य की स्थापना होगी अन्य सब प्रयत्न निरर्थक सिद्ध होंगे। अगर गांव नष्ट हो जाए, तो हिंदुस्तान भी नष्ट हो जाएगा । वह हिंदुस्तान ही नहीं रह जाएगा । दुनिया में उसका 'मिशन' ही खत्म हो जाएगा। सच तो यह है कि हमें गांव वाला भारत और शहरों वाला भारत, इन दोनों में से एक को चुन लेना है । देहात उतने ही पुराने हैं, जितना कि यह भारत पुराना है। शहरों को विदेशी आधिपत्य ने बनाया है। जब यह आधिपत्य मिट जाएगा, तब शहरों को देहात के मातहत होकर रहना पड़ेगा । आज तो शहरों का बोलबाला है और वह गांव की सारी दौलत खींच लेते हैं । इससे गांव का ह्वास एवं नाश हो रहा है । गांवों का शोषण खुद एक संगठित हिंसा है । अगर हमें स्वराज्य की रचना अहिंसा के पाये पर करनी है, तो गांव को उनका उचित स्थान देना होगा। संदर्भ:-हमारें गांवों का पुनर्निर्माण- गांधी जी |

गांवों का पुनर्निर्माण अध्याय-2 स्वराज्य में ग्राम सेवा

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गांवों का पुनर्निर्माण अध्याय-2 भाग-1 स्वराज्य में ग्राम सेवा स्वयंसेवक एवं स्वयंसेविकाएं गाँव में जाकर लोगों को स्वराज्य धर्म की शिक्षा दें । वे गांवों को साफ और स्वावलंबी बनाने का धर्म लोगों को सिखाएं । स्वराज्य में सरकार गाँवों को साफ नहीं कराएगी, बल्कि लोग उन्हें आओने समझकर खुद ही साफ करेंगे । ग्रामोद्योग का नाश हो जाने से गाँव बारबाद हो गए है ;ग्रामोद्योग का पुनरुद्धार करने से ही उनका पुनरुद्धार होगा । इसमें चरखा मध्य बिन्दु है और उसके आसपास दूसरे धंधे प्रतिष्ठित हैं। ............... इस तरह हर आदमी परिश्रम का मूल्य समझे और अगर सब्लॉग परिश्रमी बन जाएं और जनता के कल्याण के लिए कार्य करें, तो जनता के लाखों रुपये बच जाए, उसके धन की वृद्धि हो और वह कम से कम कर देकर अधिक से अधिक सुखी हो । अहिंसक स्वराज्य में कोई किसी का शत्रु नहीं होगा, सब अपना- अपना काम करेंगे, ...