अध्याय 2
भाग –2, ग्राम-स्वराज्य
ग्राम स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि
वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातन्त्र होगा,जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर
नहीं करेगा ; और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए – जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य
होगा- वह परस्पर सहयोग से काम लेगा । इस तरह हर एक गाँव का पहला काम यह होगा कि वह
अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले ।उसके पास इतनी फाजिल
जमीन होनी चाहिए, जिसमें ढोंर चर सकें और गाँव के बड़ों एवं बच्चों के लिए मन बहलाव
के साधन एवं खेलकुद के मैदान का बंदोबस्त हो सके। इसके बाद भी जमीन बची, तो वह उसमें
ऐसी उपयोगीं चीजें बोएगा, जिन्हें बेचकर वह आर्थिक लाभ उठा सकें; यों वह गांजा, तंबाकू,अफीम,वगैरह
की खेती से बचेगा । हर एक गाँव में गाँव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा-भवन रहेगा
। पानी के लिए उसका अपना अलग इंतजाम होगा – वाटरवर्क्स होगा, जिससे सभी गाँव वालों
को शुद्ध पानी मिला करेगा । कुओं और तालाबों पर गाँव का नियंत्रण रखकर काम किया जा
सकता है । बुनियादी तालिम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगी । जहां तक
हो सकेगा, गाँव के सारे काम सहयोग के आधार पर किए जाएंगे । जात-पात एवं क्रमागत अस्पृश्यता
के जैसे भेद आज हमारे समाज में पाए जाते हैं, वैसे इस ग्राम समाज में बिलकुल नहीं रहेंगे
। सत्याग्रह और असहयोग के शास्त्र के साथ अहिंसा की सता ही ग्रामीण समाज का शासन-बल
होगी । गाँव की रक्षा के लिए ग्राम-सैनिकों का एक ऐसा दल रहेगा, जिसे लाजिमी तौर पर
बारी-बारी से गाँव के चौकी-पहरें का काम करना होगा । इसके लिए गाँव में ऐसे लोगों का
रजिस्टर रखा जाएगा । गाँव का शासन चलाने के लिए हर साल गाँव के पाँच आदमियों की एक पंचायत चुनी जाएगी । इसके लिए नियमानुसार एक खास
निर्धारित योग्यता वालें गाँव के बालिग स्त्री-पुरुष को अधिकार होगा की वे पंच चून
लें । इन पंचयतों को सब प्रकार की आवश्यक सत्ता और आधिकार रहेंगे । चुकि इस ग्राम-स्वराज्य
में आज के प्रचलित अर्थों में सजा या दंड का कोई रिवाज नहीं रहेगा, इसलिए यह पंचायत
अपने एक साल के कार्यकाल में स्वयं ही धारासभा, न्यायलय और कारोबारी सभा का सारा काम
संयुक्त रूप से करेगी । आज भी कोई गाँव चाहे तो अपने यहाँ इस तरह के प्रजातन्त्र को
कायम कर सकता है । उसके इस काम में मौजूद सरकार भी ज्यादा दस्तंदाजी नहीं करेगी । क्योंकि
उसके गाँव से जो भी कारगर संबंध है, वह सिर्फ मालगुजारी वसूल करने तक ही सीमित है ।
यहाँ मैंने इस बात का विचार नहीं किया है कि इस तरह के गाँव के आस-पड़ोस के गांवों के
साथ या केन्द्रीय सरकार के साथ, अगर वैसी कोई सरकार हुई, क्या संबंध रहेगा ? मेरा हेतु तो ग्राम शासन की एक रूपरेखा पेश करने
का ही है । इस ग्राम-शासन में व्यक्तीगत स्वतंत्रता पर आधार रखने वाला सम्पूर्ण प्रजातन्त्र
काम करेगा । व्यक्ति हीं अपनी इस सरकार का निर्माता होगा । उसका सरकार और वह दोनों
ही अहिंसा के नियम के वक्ष होकर चलेंगे । अपने गाँव के साथ वह सारी दुनिया की शक्ति का मुकाबला
कर सकेगा । क्योंकि हर एक देहाती के जीवन का सबसे बड़ा नियम यह होगा कि वह अपनी और अपने
गाँव की इज्जत की रक्षा के लिए मर मीटे ।
जो चित्र यहाँ उपस्थित किया गया है, उसमें
असंभव जैसी कोई चीज नहीं है । संभव है ऐसे गांवों को तैयार करने में एक आदमी की पूरी
जिंदगी खतम हो जाय । सच्चे प्रजातन्त्र का और ग्राम-जीवन का कोई भी प्रेमी एक गाँव
को लेकर बैठ सकता है । उसी को अपनी सारी दुनिया मानकर उसके काम मे गड़ सकता है । निश्चय
हीं उसे इसका बड़ा अच्छा फल मिलेगा । वह गाँव में बैठते हीं एकसाथ गाँव के भंगी, कतवैये,
चौकीदार, वैद्य और शिक्षक का काम शुरू कर देगा । अगर गाँव का कोई आदमी उसके पास फटके, तो भी वह संतोष के साथ अपने सफाई और कतायी
के काम में जुटा रहेगा ।
संदर्भ:-हमारे गांवों का पुनर्निर्माण-
गांधी जी
लेखक- धमेन्द्र भाई
युवा सामाजिक कार्यकर्ता
गाँव-सिवन, पोस्ट- धनेज, थाना-
करगहर
जिला - रोहतास , सासाराम बिहार
मो- 8115073618,9471836040
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धमेन्द्र भाई
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