जब कोई दाहिने गाल पर तमाचा मारे, तो बायां गाल सामने कर दें

       " जब तेरे दाहिने गाल पर तमाचा मारे, बायां गाल भी सामने कर दे"

प्रायः ऐसे सुनने को मिलता है कि गांधी जी ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति तुम्हारे एक गाल पर तमाचा मारे तो दूसरा गाल भी स्वयं उसके सामने कर दे। क्या सचमुच में गांधी जी ने ऐसा कहा या लोगों का भ्रम है?  गांधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे शायद इसलिए उन्होंने कहा हो । इसी तरह के तमाम दलीलों के साथ लोग अपनी इस बात की पुष्टि करने का प्रयास करते है। परंतु इस वाक्या की असलियत क्या है आइए अब इसको जानने का प्रयास करते है।

गांधी जी वकालत पढ़ने के लिए विलायत गए हुए थे । वहां उनकी मुलाकात कुछ विलायती लोगों से हुई और दोस्ती भी बनी। एक बार की बात है कि उनके दोस्त लोग ने उनको एक अन्नाहारी छात्रावास में बुलाया । जहाँ वे गए उन्हें एक ईसाई सज्जन मिलें। उन्होंने गांधी जी के साथ धर्म की चर्चा की । इसपर गांधी जी ने उनको अपने राजकोट का पूरा संस्मरण कह सुनाया।  गांधी जी के इस संस्मरण को सुनकर वे (ईसाई सज्जन) काफी दुखी हुए । उन्होंने कहा(इसाई सज्जन) " मैं स्वयं अन्नाहरी हुँ। मद्यपान भी नही करता। यह सच है कि बहुत से इसाई मांस खाते हैं और शराब पीते है, पर इस धर्म में दो में से एक भी वस्तु का सेवन करना कर्तव्य -रूप नही है। मेरी सलाह है कि आप बाइबल पढ़ें।"  गांधी जी ने उनकी सलाह मान ली । गांधी जी वहीं इसाई सज्जन ने बाइबल भी खरीदकर दिया और शायद इसलिए कि वे बाइबल बेचते थे। उन्होंने नक्शे और विषय-सूची से युक्त बाइबल गांधी जी को दी। गांधी जी ने लिखा है " मैंने उसे पढ़ना शुरू किया , पर मै 'पुराना इकरार '(ओल्ड टेस्टामेंट) तो पढ़ हीं न सका। 'जेनेसिस 'सृष्टि- रचना' के प्रकरण के बाद तो पढ़ते समय मुझे नींद ही आ जाती। मुझे याद है कि' मैंने बाइबल पढ़ी है' यह कह सकने के लिए मैंने बिना रस के और बिना समझे दूसरे प्रकरण बहुत कष्टपूर्वक पढ़े थे। 'नम्बर्स ' नामक प्रकरण पढ़ते - पढ़ते मेरा जी उचित गया।"
" पर जब 'नये इकरार '(न्यू टेस्टामेंट)पर आया , तो कुछ और हीं असर हुआ । ईसा के' गिरी प्रवचन' का मुझपर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उसे मैंने हृदय में बसा लिया । बुद्धि ने गीता जी के साथ उसकी तुलना की। ' जो तुझसे कुर्ता माँगे उसे अंगरखा भी दे दो','जो तेरे दाहिने गाल पर तमाचा मारे, बायां गाल भी उसके सामने कर दें' - यह पढ़कर मुझे अपार आनंद हुआ। शामल भट्ट के छप्पय की याद आ गयी । मेव बालमन ने गीता , अर्नाल्ड-कृत बुद्ध-चरित और ईसा के वचनों का एकीकरण किया। मन को यह बात जँच गयी कि त्याग में धर्म है" 
इस प्रकार गांधी जी ने इस प्रकरण को अपने आत्मकथा में लिखा है।

संदर्भ- सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
                   मो. क. गांधी।

लेखक- धमेंद्र कुमार उपाध्याय
ईमेल- dhamendrau@yahoo. com

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