प्यासे पंछियों और जानवरों की आवाज

 हम इंसान है इसलिए हमें प्यास लगती है। लेकिन ये सत्य नही है जनाब इन पंछियों बेखौफ रोड पर मनचले की तरह घूमने वाले जानवरों को भी प्यास लगती है और उन्हें भी अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की ही जरूरत होती है। हम सभी लोग इस बात को जानते है लेकिन लेकिन हम कुछ नही करते है। क्योंकि हम समझते है कि वो कंही भी पानी पी लेंगे। लेकिन जनाब क्या सही में ऐसा है कि जिन पंछियों और जानवरों को हम रोज आसमान में उड़ते और सड़कों या खेतों पहाड़ों पर घमते देखते है उनके पीने के लिए पानी की सुविधा हम मनुष्यों ने छोड़ रखा है। नही क्योंकि हमलोगों ने सभी तालाबों और कुँवाओ को ढंक दिया है या फिर तालाबों को खेत मे परिवर्तित कर चुके है। दोस्तों जैसे हमे अपने प्रकृति के साथ मिलकर उसके दिए हुए संसाधनों का उपयोग करने का हक प्रकृति ने दिया है वैसे ही इन पंछियों एवं जानवरों को भी है। आज हम मानवों का अस्तित्व आज विद्यमान है तो कहीं न कहीं इसमें इन पंछियों ओर जानवरों का भी योगदान है। लेकिन आज का मानव समाज इन पंछियों और जानवरों के बारे में सोचना ही बन्द कर दिया है। आज सभी मानव हर एक चीज के अंदर अपने स्वार्थ के ही चीजों को देखते है। मित्रों आज वो समय आ गया है कि हम सबको अपने समाज के रक्षा के लिए इन का ध्यान रखना होगा । हमको अपनी प्यास बुझाने के लिए यदि पानी की जरूरत होती है तो वैसे ही इन पंछियों और जानवरों को भी अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी की आवश्यकता होती है। हमलोग के पास इतना संसाधन है कि हमलोग नल, कल इत्यादि का उपयोग कर अपने पानी की व्यवस्था कर लेते है लेकिन ये पंछियों और जानवरों के बारे में भी सोचो ये कैसे अपना प्यास बुझाते है? इस विचार से मैं अपने सभी मित्रों से अनूरोध करता हूँ कि वो जहां भी हो सके एक छोटे से बर्तन में पानी भरकर अपने छत, बरामदे या घर के आगे रख दे जिससे कि आसमान के सोभा बढ़ाने वाले इन पंछियों का भी प्यास बुझ जाएगा। जिंदगी का असली मजा प्यासे को पानी पिलाने में ही है। 


धमेंद्र कुमार उपाध्याय 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ,वर्धा 
Mo.8115073618

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