हमारे गांवों का पुनर्निर्माण , अध्याय 2 भाग – 3 समग्र-ग्राम-विकास

अध्याय 2

भाग – 3

समग्र-ग्राम-विकास

देहात वालों में वह कला और कारीगरी होनी चाहिए, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत की जा सके । जब गांवों का पूरा-पूरा विकास हो जाएगा, तो देहातियों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरी के धनी स्त्री-पुरुषों की कमी गांवों में नहीं रहेगी । गांवों में कवि होंगे,चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के पंडित होंगे और खोज करने वाले लोग भी होंगे । थोड़े में, जिंदगी की ऐसी कोई छीजी न होगी जो गांवों में न मिले । आज हमारे गाँव उजड़े हुए है और कुड़े-कचरे के ढेर बने हुए हैं । कल वहीं सुंदर बगीचे होंगे और ग्राम वासियों को ठगना या उनका शोषण करना नामुमकिन हो जायगा ।

इस तरह की गांवों की पुनर्रचना का काम आज से ही शुरू हो जाना चाहिए । गांवों की पुनर्रचना का काम कामचलाऊ नहीं, बल्कि स्थायी होना चाहिए । उद्योग,हुनर,तंदरुस्ती और शिक्षा इन चारों का सुंदर समन्वय करना चाहिए । नई तालिम उद्योग और शिक्षा, तंदरुस्ती और हुनर का सुंदर समन्वय है । इन सब के मेल से माँ के पेट में आने के समय से लेकर बुढ़ापे तक का एक खूबसूरत फूल तैयार होता है । यही नयी तालिम है । इसलिए मैं शुरू में ग्राम- रचना के टुकड़े नहीं करूंगा, बल्कि यह कोशिश करूंगा कि इन चारों का आपस में मेल बैठे । इसलिए मैं किसी उद्योग और शक्षा को अलग नहीं मानूँगा, बल्कि उद्योग को शिक्षा का जरिया मानूँगा,और इसीलिए ऐसी योजन में नयी तालिम को शामिल करूंगा ।

                                                                                                                                    - हरिजन सेवक,10-11-46

पैसे का स्थान

[घनश्याम दस बिड़ला के साथ हुई बातचीत]

“आप खूब पैसा इकट्ठा करके अपने ग्राम कार्य को एक अच्छे विशाल क्षेत्र में क्यों नही फैलाते ?”

“नहीं, जीतने की मुझे जरूरत होती है, उससे ज्यादा पैसा इकट्ठा करने में मेरा विश्वास नही है।”

“पर मान लीजिए, आप बीस, और बीस न सही दस ही, गाँव नमूने के बना दें तो कैसा हो ?

“अगर यह इतना आसान काम हो, तो तुम अपने रुपये से यह काम कर सकते हो । मगर मैं जानता कि यह काम इतना आसान नहीं है । यह बात नहीं कि रुपये जादू की लकड़ी फेरते ही कोई गाँव नमुने का बन  जायगा ।”

                                                                                   - हरिजनसेवक,30-11-35

डॉ. मॉट: अगर भारत को पैसा दिया, तो बिना किसी तरह का नुकसान पहुचाए बुद्धिमानी से किस तरह दिया जा सकता है ? क्या पैसा देने से कोई लाभ होगा ?

गांधी जी:  नहीं। जब पैसा दिया जाता है ,तो वह नुकसान के शिवा कुछ कर ही नहीं सकता । जब पैसे की जरूरत हो, तब उसे खुद कमाना चाहिए । मेरा यह पका विश्वास है कि मिशनरी सोसायटियों जो अमरीकी और ब्रिटिश पैसा दिया गया है, उसने फायदे के वजाय नुकसान ही ज्यादा किया है । आप ईश्वर और धन की एकसाथ पूजा नहीं कर सकते । मुझे भय है कि धन को भारत की सेवा करने के लिए भेज गया है और ईश्वर पीछे रह गया है; नतीजा यह होगा कि एक दिन ईश्वर इसका बदला लेगा । जब कोई अमेरिकन कहता है कि ‘मैं पैसे से तुम्हारी सेवा करूंगा’, तो मुझे उससे डर लगता है । मैं उससे यहीं कहता हूँ कि ‘ हमारे यहाँ आपके इजीनियरों को भेजिए, जो यहाँ पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि हमें अपने वैज्ञानिक ज्ञान का लाभ देने के लिए आयें । अनुभव के आधार पर मुझे यह पक्का विश्वास हो गया है कि आत्मा से संबंध रखने वाली बातों में पैसे का कोई स्थान नहीं है ।

                                                                                                                           -हरिजनसेवक, 26-12-36     

 संदर्भ:-हमारे गांवों का पुनर्निर्माण- गांधी जी

लेखक- धमेन्द्र भाई

युवा सामाजिक कार्यकर्ता

गाँव-सिवन, पोस्ट- धनेज, थाना- करगहर

जिला - रोहतास , सासाराम बिहार

मो- 8115073618, 9471836040



 

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