महामना मदन मोहन मालवीय जी अपने नाम में मालवीय कैसे लिखते थे ?
महामना मदन मोहन मालवीय
जी अपने नाम में मालवीय कैसे लिखते थे ?
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महान पंडित मदन मोहन
मालवीय जी थे । इनका गोत्र तो भरद्वाज था, और चतुर्वेदी इनका आस्पद था । इनके पितामह
थे पंडित प्रेमधर जी चतुर्वेदी और इनके पिता जी का नाम था पंडित ब्रजनाथ चतुर्वेदी
। माता जी का नाम था मूना देवी । मालवीय जी के पितामह एवं पिताजी अपने को चतुर्वेदी
लिखते और कहते रहे । फिर क्यों श्री मदनमोहन मालवीय जी अपने को भरद्वाज गोत्रीय चतुर्वेदी
न लिखकर “मालवीय” लिखना शुरू किए ? और इसी नाम से वे जग जाहीर हुए ।
‘मालवीय’ का अर्थ है ‘मालवा का’ यानि की मालवा का रहने वाला
। किसी समय (1449) में मलवीय जी के पूर्वज मुसलमान शासकों के अत्याचार से पीड़ित होकर
मालवा को छोड़कर उतर प्रदेश के नगरों में बस गए – कुछ लखनऊ में, कुछ मिर्जापुर में और
कुछ प्रयाग में आकर बसे। मालवीय जी के पुरखे प्रयाग में बसे और अपने को चतुर्वेदी कहकर
प्रसिद्ध किया ।
इस रहस्य का एक कारण मालूम होता है । मालवीय जी यह नही चाहते
थे की उत्तर प्रदेश में रहने के कारण लोग उन्हें ‘मथुरा के चौबे’ समझ लें । मालवीय
जी इस बात की चिंता करते रहे कि मालवा से उनका संबंध भूल से भी न लोगों के दिलों से
मीट जाए । जिस श्रीगौड़ वंशीय ब्राम्हण परिवार में मालवीय जी का जन्म हुआ था उसे लोग
बाद में भुला न दें, इसलिए वे अपने को मालवीय लिखने लगे । मलवीय जी यह भी नही चाहते
थे कि मालवा के श्रीगौड़ ब्राम्हणों से उनका कोई संबंध न रह जाए । बाद में उन्होंने
सात व्यक्तियों का एक शिष्ट मण्डल मालवा भेजा और मालवा के श्रीगौड़ ब्राम्हणों को अपने
घर में आमंत्रित कर उन्हें भोजन कराया । जो लोग मालवा से आए भागकर उत्तर प्रदेश के
प्रयाग आदि नगरों में आ बसे थे, उनका मालवा से संबंध था । इसी बात पर जोर देने के लिए
मालवीय जी ने अपने को मालवीय कहना आरंभ किया ।
श्रीगौड़ यदपि मालवा से आए थे, लेकिन मालवीय जी रोटी-बेटी का
संबंध पंच गौड़ में करने के पक्ष में थे । इसलिए संभव है कि उन्होनें आदि में मालवा
के श्रीगौड़ ब्राम्हणों से अपना संबंध फिर से स्थापित किया । पंच गौड़ ब्राम्हण की संख्या
बहुत बड़ी है, और पंच-गौड़ ब्राम्हण की कन्या का विवाह उसी की बिरादरी में आसानी से हो
सकता है । इस संबंध में उनके क्या विचार थे, यह इसी से प्रकट है कि उन्होंने अपनी एक
पौत्री का अंतर्जातीय विवाह किया था ।
वे हिन्दू समाज में सुधार करने के पक्षपाती थे, लेकिन वह वहीं
तक जाने के लिए तैयार थे, जिसको वह शास्त्र-सम्मत और विधि-विहित मानते थे । हिन्दू
समाज में धीरे-धीरे सुधार करना वह चाहते थे । वह क्रांति के नही बल्कि विकास के पुजारी
थे । उनका कहना है कि यदि भारत को सभ्य संसार की बराबरी करी है तो समाज में सुधार की
गति तीव्र होनी चाहिए ।

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