सफलता की कुँजी
सफल बनना है तो आलस्य को त्यागें। आलस्य से जीवन के रचनात्मक पल नष्ट हो जाते हैं।
आलसी मत बनें
आलसी की तुलना उस तालाब से की जा सकती है, जिसके पानी में,सीमा में बंध जाने की वजह से , सरांध व काई जम जाती है। जबकि अनवरत चलने वाली नदी का पानी सदैव निर्मल रहता है।
यदि आप दिनभर घर में पड़े रहते हैं तो आपके हाथ पैर जकड जाएँगे। आपको चलने फिरने में दिक्कत होगी। मनुष्य तो मनुष्य मशीन से यदि काम न लिया जाए तो उसके कलपुर्जे काम करना बंद कर देते हैं।
बहुत पुरानी बात है। किसी देश में एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था। वह काफी मेहनती था। खेतों में काम करके अपना गुजारा करता था। उसके तीन लड़के थे जो बड़े ही आलसी थे। उसकी आलस्य की वजह से बूढा और उसकी पत्नी काफी परेशान रहते थे। दोनों अपने लड़कों को समझाने की कोशिश करते लेकिन तीनों अपने आलसीपन से बाज नहीं आए।
एक दिन बूढा किसान चल बसा। बुढ़िया ने अपने बेटों को खेत पर जाने के लिए कहा, लेकिन वे गए नहीं। जब तक अनाज था बुढ़िया ने उनको बना –बना कर खिलाया ,आखिर में एक दिन घर का सारा अनाज ख़त्म हो गया। जब घर में एक भी दाना नहीं बचा तो बुढिया ने अपनों बेटों से काम धंधे के लिए कहा लेकिन वे तब भी नहीं गए।
एक दिन सुबह बुढ़िया उठ कर रोने लगी। माँ को रोते देखकर उसके बेटों ने पूछा तो माँ ने बताया, “सपने में तुम्हारे पिता आए थे। उन्होंने बताया कि यदि तुम लोग खेत में से गड़ा हुआ धन निकल कर ले आओ तो हमारी गरीबी दूर हो सकती है।”
लड़कों ने कहा,“तो इसमें रोने की बात क्या है।”
बुढ़िया बोली, “मैं तो यह सोच कर रो रही हूँ कि अब खेत खोद कर कौन धन निकल कर लायेगा? किसी दूसरे से कह भी नहीं सकती हूँ, इसीलिए रो रही हूँ।”
बुढ़िया की बात सुनकर तीनों बेटे खेत में जाकर जमीन खोदने लगे। तीनों बेटे एक ही जगह खुदाई कर रहे थे I
यह देखकर बुढ़िया ने कहा, “ धन खेत में कहीं भी हो सकता है इसलिए पूरे खेत की अच्छे से खुदाई करो।
पूरा खेत खुद जाने के बाद जब धन नहीं मिला तो तीनों बेटे नाराज हो गए।
बुढिया ने कहा,” ठीक है ! सपने में तुम्हारे पिता के आने पर मैं उनसे इसकी शिकायत करूंगी। जब खेत की खुदाई हो गई है तो क्यों न इसमें अनाज बो दिया जाए।”
बेटों ने अनाज बो दिया। कुछ ही दिनों में खेत में फसल लहराने लगी।
फसल काटने का वक्त आया तो एक दिन बुढिया फिर रोने लगी।
बेटों ने पूछा, ”अब क्या हुआ ?
“तेरे पिता सपने में आये थे कहने लगे फसल को काट कर बाज़ार में बेच कर आओ, तब उन्हें धन के बारे में बताएँगे।”
बेटों ने धन के लालच में फसल काटकर बाज़ार में बेचने गए। फसल बेचने पर जब उन्हें धन मिला तो तीनों बेटे बहुत खुश हुए। उस दिन से तीनों ने आलस्य त्याग कर खेत में कम करने लगे।
यदि आप अमीर बनना चाहते हैं या अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं तो आलस्य से बचें। आलस्य गरीबी है, आलस्य असफलता है, आलस्य नाकामयाबी है, आलस्य अमीरी का दुश्मन है। आलस्य को दूर भगाएं और सफल व्यक्ति बन जाएँ।
सफल बनना है तो आलस्य को त्यागना होगा। आलस्य से जीवन के रचनात्मक पल नष्ट हो जाते हैं।
इंद्र और अगस्त्य के संवाद के रूप में सूक्त है I
न नूनमस्ति नो शवः कस्तद वेद यदद्भुतम |
अन्यस्यचित्तमभि संचरेण्यमुताधीतं वि नश्यति ||
(ऋक्वेद १ I १७० I १ )
इंद्र यहाँ परमैश्वर्यशाली प्रभू हैं और अगस्त्य –‘अगं अस्यति’ कुटिलता को छोड़ने वाला जीव है Iजीव व्रत लेता है, परन्तु उसे छोड़ बैठता है या कई बार प्रारंभ ही नहीं करताI प्रभु कहते हैं कि निश्चय से पहले जो जीव व्रत लेता ही नहीं फिर उसे अपने आप प्रारम्भ करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता I कल भी वह आरम्भ नहीं होता I कल ,फिर कल करते हुए वह टलता ही रहता है Iप्राण साधना का व्रत लें,उस व्रत का दीर्घ काल तक ,निरंतर ,आदरपूर्वक पालन करें तो योग की उन सिद्धियों को क्यों नहीं प्राप्त करेंगे I परन्तु सामान्य मनुष्य का मन चरणशील है ,भटकने वाला है Iइसलिए यह किसी व्रत को नहीं निभा पाताI उन्नति हो तो कहाँ से हो I
भावार्थ यह है कि मन को मत भटकाओ I काम करने का व्रत लो I कल का काम आज करो और अपरान्ह का काम पूर्वान्ह में I कल इसे करने के लिए समय मिलेगा ,या कोई दूसरा जरूरी काम आ जाएगा ,कौन जानता है I इसलिए बिना आलस्य या प्रमाद के उसे तुरंत पूरा करें I
आलसी मनुष्य के क्या लक्षण हैं
अनारम्भो हि कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम् |
प्रारब्धस्य अन्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम् ||
आलसी लोगों की बुद्धि के दो लक्षण होते हैं –प्रथम तो कार्य को आरम्भ ही नहीं करना और दूसरा भाग्य के भरोसे बैठे रहना I
आलस्य का त्याग कर विश्वासपूर्वक पुरुषार्थ करने से निश्चित सफलता प्राप्त होती है I
इसलिए जीवन में सफलता हासिल करना चाहते है तो आलस्य को अपने पास आने न दें।
आलस्यं हि मनुष्याणां- शरीरस्थो महान् रिपुः |
नास्त्युद- यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||
अर्थात् : मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता|
नालसा: प्राप्नुवन्त्यर्थान न शठा न च मायिन: न च लोकरवाद्भीता न च शश्वत्प्रतीक्षिण:
आलसी मनुष्य कभी भी धन नहीं कमा सकता (वह अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता)| दूसरों की बुराई चाहने वाला तथा उनकी वंचना करने वाला, “लोग क्या कहेंगे” यह भय रखनेवाला, और अच्छे मौके के अपेक्षा में कॄतिहीन रहनेवाला भी धन नहीं कमा सकता।
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