स्वाध्याय


स्वाध्याय
प्राचीन काल में विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल एवं आश्रम में जाकर बारह साल तक रहकर अध्यययन करते थे एवं गुरुकुल का यही रिवाज था ।अध्ययन अवधि को पूर्ण करने के बाद जो शिष्य घर को जाना चाहते थे उनको आचार्य जी अंतिम उपदेश देकर विदा  करते थे । वे शिष्य को “सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायात् मा प्रमद:” (तैती 7) – अर्थात सच बोल, धर्म पर चल और स्वाध्याय से मत चूक । इन तीन सूत्रों का आशीर्वाद देकर गुरु शिष्य को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए ऊर्जावान बनाकर भेजते थे । इन तीन सूत्रों में ही ऋषि का सारा शिक्षा एवं सिखावन आ जाता था । उपनिषद में यह सबसे प्रसिद्ध उपदेश है । 

भक्ति-मार्ग में जिसे श्रवण भक्ति एवं कीर्तन भक्ति कहा जाता है उसी को उपनिषद में स्वाध्याय एवं प्रवचन कहा जाता है । नाम भिन्न है लेकिन अर्थ दोनों का समान है । स्वाध्याय अर्थात स्वयं के अध्ययन के माध्यम से सीखना एवं प्रवचन यानि की दूसरों को सिखाना । इस सीखने एवं सिखाने पर उपनिषद में भी उतना ही बल दिया गया है, जितना की भक्ति में श्रवण एवं कीर्तन पर संतों ने दिया है । स्वाध्याय एवं प्रवचन अर्थात सीखने एव सिखाने का महत्व ऋषियों की दृष्टि में इतना ज्यादा था कि मनुष्य के लिए आचरण करने के योग्य धर्म के तत्व बतलाते हुए उन्होंने प्रत्येक तत्व के साथ स्वाध्याय – प्रवचने च (तैति 5) का बार – बार उल्लेख किया है ।

मनुष्य के जीवन के लिए अनेक साधन बताये गए हैं- तप, दान, अतिथिसेवा आदि । हर एक साधन के साथ अध्ययन-अध्यापन जोड़ा गया है । बार बार कहा गया है कि ऋतम होना चाहिए साथ में स्वाध्याय भी होना चाहिए । सत्य भी होना चाहिए साथ में स्वाध्याय भी । इंद्रियों का दमन होना चाहिए साथ में स्वाध्याय भी होना चाहिए । एक-एक साधन का नाम लेकर उसके साथ स्वाध्याय को जोड़ दिया गया है । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च -  तपश्चर्या के साथ-साथ अध्ययन होता है तो तप का भर कम हो जाता है, तप में मधुरता आती है । तपश्चर्या मधुर बनती है । इस प्रकार प्रत्येक कर्तव्य को अलग-अलग कहकर हर बार ऋषि ने स्वाध्याय – प्रवचन का हेतु और विषय तो बतलाया ही है, साथ ही उसका महत्व भी बता दिया है । सभी कर्तव्यों के साथ ही अध्ययन-अध्यापन को संपुट जोड़ दिया है ।

हमारे यहाँ का विचार है कि विद्याध्यन की क्रिया आमरण जारी रहनी चाहिए । जिस प्रकार से लोग प्रतिदिन स्नान करते हैं, आहार ग्रहण करते है उसी प्रकार से प्रतिदिन अध्ययन भी होना चाहिए । जिस मनुष्य का अध्ययन नित्य-निरंतर चलता रहता है,वह हमेशा ताजा रहता है । उसके प्रतिभा में नए – नए विचार पनपते रहता हैं, उसे कभी बुढ़ापा नही आती है । अध्ययनशील व्यक्ति का शरीर जैसे- जैसे जीर्ण होता है, वैसे - वैसे उसकी स्मृति और चिंतन-शक्ति उज्ज्वल होती चली जाती है । एक बार भगवान बुद्ध ने कहा था कि “ जैसे व्यक्ति रोज स्नान करता है, तो शरीर स्वच्छ होता रहता है, रोज झाड़ू लगाते रहने से घर स्वच्छ रहता है, वैसे ही रोज अध्ययन करते रहने से मन भी स्वच्छ बना रहता है ।”

स्वाध्याय का अर्थ मैं यह नही करता कि किताब पढ़कर फेंक दिए और फिर दूसरी किताब उठा लिए । इसके बाद दूसरी लेने के बाद पहली में क्या पढे उसे भूल गए । यह स्वाध्याय नही हो सकता है । इसे स्वाध्याय नही कहते है । ‘स्वाध्याय’ का मतलब है कि एक ऐसे विषय का अभ्यास, जो सभी विषयों एवं कार्यों का मूल है, जिसके ऊपर बाकी सभी विषयों का आधार है, लेकिन जो खुद किसी दूसरे विषय पर आश्रित नही है । उस विषय में पूरे दिनभर में थोड़े समय के लिए एकाग्र होने की आवश्यकता है । पुस्तकों का अध्ययन स्वाध्याय में आएगा ही । परंतु वह ऊपरी छिलका है - ‘स्व’ यानि की स्वयं, अध्याय यानि कि अध्ययन । इस परकर अपने शुद्ध निर्मल रूप का अ ध्ययन ही स्वाध्याय है ।

                                                                                   

लेखक- धमेन्द्र भाई
युवा सामाजिक कार्यकर्ता
गाँव-सिवन, पो-धनेज, जिला- रोहतास, बिहार
मो- 9471836040, 8115073618
संदर्भ – शिक्षण विचार, विनोब भावे
पेज नंबर -  13&14
                                                                 

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