शाश्वत जीवनशैली का विकल्प रचनात्मक कार्यक्रम
शाश्वत जीवनशैली का विकल्प
रचनात्मक कार्यक्रम
शाश्वत जीवनशैली हम अकेले प्राप्त नहीं कर सकते, यह सामूहिक
प्रयास है। हम दूसरे के कल्याण के द्वारा ही खुद का कल्याण कर सकते हैं । इस बात को
अगर हम अब भी नहीं समझ पाएं हैं तो नतीजा हमारे सामने है । .................
यदि
हम सभी प्राणी जीवित हैं या इस प्रकृति प्रदत में अपनी उपस्थिति को दर्ज करा रहें है,
तो सबसे पहले हम सभी को इस प्रकृति को धन्यवाद देना होगा एवं इसको समझना होगा । किन्तु
प्रकृति का अनमोल रचना हम मानव एवं उसके सहजीवी समस्त प्राणी जगत है । इस धरा पर सभी
प्राणीयों में मानव को श्रेष्ठ प्राणी का दर्जा प्राप्त है । यह श्रेष्ठता का उपाधि
हमारे धार्मिक ग्रंथों एवं बड़े बड़े ऋषियों के वचनों को सुनने के बाद जान पड़ता है ।
किन्तु हम मानव इस श्रेष्ठता के उपाधि पाने के बाद अपने आप को सबसे शक्तिशाली समझ बैठे
एवं यह भूल बैठे की प्रकृति नाम की भी कोई चीज होती है ।
प्रायः
हमारे धार्मिक व्यक्तियों के प्रवचन एवं कथाओं में भी यह ज्ञान का प्रवाह किया जाता
है की हम मानव को ही नही सभी जीव को “भगवान”
ने बनाया है । लेकीन क्या आज तक हमें इस बात का ज्ञान नहीं की आखिर यह भगवान है
कौन ? भारतीय संस्कृति सम्पूर्ण विश्व में सबसे सभी तरह से धनवान संस्कृति है । जिसका
मूल मंत्र है – वसुधैव कुटुंबकम । जिस संस्कृति में पूरे धरा को ही स्वीकार
किया जाता है । फिर भी हम अपनी संस्कृति को नजरअंदाज करते हुए अपने निज स्वार्थ की
पूर्ति करते हैं । जिसका नतीजा हमसभी देख रहें है । जब हम भगवान की बात करते हैं तो हमलोग को भगवान को भी समझना चाहिए । भगवान:-
भ- भूमि , ग- गगन, व- वायु, आ- आग(अग्नि), न- नीर। अर्थात हमसभी प्राणीजगत की
रचना इन सभी पंचमहाभूतों के एक समन्वित संरचना एवं संयोग से हुआ है । इन्हीं पंचमहाभूतों
से ही समस्त प्रकृति का सृजन हुआ है । इसलिए हम सभी के लिए समझना आतिआवश्यक है की जब
इन पंचमहाभूतों से हमारे शरीर का गठन हुआ है, तथा इसी से समस्त प्रकृति का जन्म हुआ
है तो हमें इनका संतुलन बनाकर रखना होगा । जब हमारे शरीर में किसी तत्व की कमी होती
है तो हम सभी किसी किसी अस्पताल में जाते हैं
एवं उस तत्व की पूर्ति भिन्न-भिन्न प्रकार के दवाइयों के उपयोग करके करते हैं । परंतु
जब इस प्रकृति को कोई कष्ट होता है तो इसके लिए हमने किस अस्पताल का निर्माण किया है
? क्या प्रकृति को भी कभी किसी तत्व की कमी होती है ? या फिर जब इसका तबीयत खराब होता
है तो इसका इलाज कैसे होता है और कहाँ होता है ? इन सभी सवालों को तभी हम सोच सकते
हैं जब हम प्रकृति को भी एक मानव शरीर के समतुल्य समझने लगते है ।
शाश्वत
जीवनशैली जीने के लिए हमें अपना विचार एवं कार्य दोनों को प्रकृतिप्रिय करना होगा ।
यहाँ पर पूज्य महात्मा गांधी जी की एक बात याद आती है की “ प्रकृति हमारे जरूरतों
को तो पूर्ण कर सकती है, इच्छाओं को नही” । किन्तु हम मानव अपने निजी स्वार्थपूर्ति
हेतु अनंत ऊर्जा के साथ प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करते जा रहें है । हमें
इस बात का तनिक भी ख्याल नही है की हमारे विदोहन से किसी प्रकार का नुकसान हो रहा अथवा
नही । हमें समस्त प्राकृतिक संसाधन का विदोहन का नियंत्र करना होगा । प्राकृतिक संसाधनों
से हमें अपने जरूरतों को पूरा करना होगा न की अनंत इच्छाओं की । फिर जितना संसाधनों
का हम उपयोग करते हैं तो प्रकृति को उसकी कमी होती है इसकी पूर्ति भी हमें करना होगा
। हम समझ सकते है की जब हमारे शरीर से एक तत्व की कमी रहती है, तो कोई-न–कोई रोग तुरंत
पैदा हो जा रहा है तो प्रकृति के साथ भी यहीं होता होगा । इसलिए हमें अपने प्रकृति
का समन्वय एवं संतुलन बरकरार रखना अतिआवश्यक है । हमें इन पंचमहाभूतों का भी सीमित
उपयोग करना होगा एवं इनकी उपलब्धता को संतुलित करना होगा ।
हम
एक उदाहरण को समझ सकते हैं – किसान खेती करता है । उसके खेत में केंचुवा एवं तमाम प्रकार
के किट रहते हैं । केचुवा जब खेत में रहता है, तो उसका पूरा-पूरा किराया वह खेत मालिक
को मिट्टी चालन का काम करके चुकाता था । जब वह खेत में मिट्टी को चालता था, तो जमीन
में छिद्र होता था। मिट्टी ऊपर नीचे होता था जिससे चारों तरफ ऑक्सीजन का मात्र भरपूर
होता था। साथ में जमीन में जो छिद्र बनता था उससे पानी का रिसाव जमीन के अंदर होता
था । जिससे हमारे पीने का पानी की आवश्यकता की
पूर्ति आसानी से होती थी । किन्तु जबसे हमने अधिक उत्पादन का लालच पाला है एवं
खेत मे विषैले हानिकारक रसायनों का प्रयोग शुरू
किया है। तभी से अनंत प्रकार के रोगों का जन्म होना शुरू हो गया । जिसका कोई
इलाज भी संभव ही हो पा रहा है । जमीन के अंदर पानी जाने के रास्तों को हमने अंधाधुंध
रसायन प्रयोग करके बंद कर दिया । जिससे जमीन के अंदर पानी जाना बंद होने लगा । जिसके
कारण जमीन के अंदर पीने योग्य पानी की कमी होने लगी । जिस कारण बड़े-बड़े शहरों ही नही
अब तो गांवों में भी पीने के पानी की भारी समस्या आने शुरू हो चुकी है । इसलिए अब भी
सचेत होने का समय आया है यदि अब भी लोग प्रकृति के आवाज को नही समझेंगे तो वहीं हाल
होगा की “विनाश काले विपरीत बुद्धि”।
खेतों
के रसायनों से निकलने वाले गैसों से लेकर शहरों में चलने वाले वीआईपी गाड़ियों धुवों
एवं रेडियशन से हवा भी दूषित हो चुका है । पिछले वर्ष भारत की राजधानी दिल्ली की स्थिति
इतनी बदतर हो चुकी थी की लोगों को सांस लेने के लिए आक्सीजन लेना मुस्किल हो गया था
। जिसके नियंत्रण के लिए दिल्ली सरकार के द्वारा ओड्ड-ईवेन फार्मूला को लागू किया गया
। हम सभी जानते हैं की हमारे प्राणवायु पेड़ पौधों से ही उत्सर्जित होते है । फिर भी
हम बड़ी-बड़ी फर्नीचर एवं सड़कों के निर्माण के
लिए घने-घने जंगलों का सफाया करते जा रहें
हैं । जिसके कारण दिन प्रतिदिन प्राणवायु की मात्रा में कमी होती जा रही है । इसलिए
हमें अपने खेती के तौर तरीकों को बदलकर एकबार फिर से प्रकृति के अनुरूप करना होगा एवं
खेती के प्रणाली को प्रकृतिप्रिय करना होगा ।
आज
ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य प्रकार के प्राकृतिक आपदाएं आ रहीं है । जिसका मार समस्त
जीव जगत भुगत रहा है । आज हम खुले आँख से देख रहें हैं की ठंडी के मौसम में भी बरसात
हो रही है । और वर्षात के मौसम में पानी के वजाए गर्मी के ओले बरस रहें है । शहरों
के बाबू लोग तो अपने AC चलाकर तो
आराम फरमा ले रहें है, किन्तु खेत में उबलता किसान किस ए.सी. को चलाए । इसलिए शहरों
के लोगों को शहरों के जीवन के बारे में ही
नहीं ग्रामीण जीवन के बारे में भी सोचना होगा । शहरों में रहने वाले लोगों को भी अपने
जीवन को चलाने के लिए अन्न एवं भोजन की आवश्यकता होती है । जिसकी पूर्ति धूप में खटता
किसान ही उत्पादन करके करता है । जब किसान अपने खेत में दिन रात एक करके उत्पादन करता
है तो शहरों के लोगों को खाने के लिए भोजन उपलब्ध हो पाता है । इसलिए बड़े-बड़े लोगों
को भी अपनी नजर एवं नजरिया को किसानप्रिय करना होगा । आज किसान खेती से अपने आप को
दूर करना शुरू कर दिया है । खुद किसान खेती-किसानी करके अपने बेटे को पढ़ाता है। किन्तु
अपने बेटे को यही सिखाता है की कितना भी खर्च लगे हम देंगे । किन्तु तुम खेती को छोड़कर
किसी भी प्रकार का नौकरी ही करो । चाहे वह छोटा ही नौकरी क्यों न हो ? और इस प्रकार
धीरे धीरे किसान भी खेती से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है । जिसपर यदि ध्यान नही दिया
गया तो आने वाले समय में खेती करने वालों की कमी होगी । जिसका नतीजा होगा की हमलोग
के लिए पर्याप्त भोजन नही मिलेगा एवं आपस में हमलोग भोजन के लिए लड़ते पाए जाएंगे ।
इसलिए हम सभी को किसान के समग्र विकास को भी ध्यान में रखते हुए अपना धर्मकर्म करना
होगा ।
हम
सभी शुद्ध भोजन तो करना चाहते है किन्तु शुद्ध उत्पादन नहीं । जिसका नतीजा हुआ की जो
भयावह रोग सिर्फ शहरों में पाया जाता था वो अब वो भी गांवों में दस्तक दे चुका है ।
जैसे – कैंसर, हर्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज इत्यादि । इन सभी का सृजनकर्ता भयानक विषैले
रसायन हैं । एक रिसर्च मे पाया गया की हम सभी अपने भोजन मे 65% रसायन को खाते हैं ।
ये सभी रसायन भोजन के रूप में जिन उत्पादों को खातें हैं तो उनके माध्यम से शरीर में
प्रवेश करते हैं । जब ये विषैले रसायन शरीर में प्रवेश करती हैं, तो भिन्न भिन्न प्रकार
के रोगों को जन्म देते है । अतः जब हम अपने खेत में रसायन का प्रयोग करते हैं, तो यह
भी देखना होगा की इसका बुरा परिणाम प्रकृति को क्या मिलेगा एवं इस उत्पादन को खाने
वालें को कितना लाभ होगा । इसलिए हमलोगो को शुद्ध खाने के लिए शुद्ध उतपादन करना होगा
। जिसके लिए हमें सजीव या जैविक खेती को अपनाना होगा । जिसमें की हम उन्ही पदार्थों
का प्रयोग करेंगे जो हमारे प्राकृतिक पर्यावरण में उपलब्ध हैं । यानि की प्राकृतिक
संसाधनों के सहयोग से होने वाली कृषि प्रणाली को अपनाना होगा । इस उत्पादन का उचित लाभ भी किसान को भी मिलेगा साथ
ही प्रकृति का भी किसी प्रकार का नुकसान नही होगा ।
जब
हम शाश्वत जीवनशैली की बात करते हैं तो हमें अपने प्रकृति के हर एक पहलू को ध्यान में
रखना होगा । हम सभी जानते हैं की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । समाज में ही अपनी समस्त
क्रियाकलापों को करता एवं सीखता है । इसलिए हमें अपने समाज में रहने वाले हर एक व्यक्ति
के बारे सोचना होगा । जो वर्ग आज भी पिछड़ा रह गया है उसको आगे लाने का काम उस समाज
के बुद्धिजीवी वर्ग को करना होगा । समाज में
सामाजिक एकता कायम करने के लिए सांप्रदायिक एकता को भी स्थापित करना भी अतिमहत्वपूर्ण
है । आज भी समाज एवं समुदाय में वैसा भी एक वर्ग रहता है । जिससे सभी वर्ग अपने से
दूरी बनाकर रखता है । ऐसे वर्ग का भी सामाजिक एवं आर्थिक विकास भी होना चाहिए । इनके
साथ जिस अस्पृश्यता का भाव रखा जा रहा है उसको मिटाना होगा । आज देश के भिन्न भिन्न
राज्यों ने शराबबंदी किया है । इसके बावजूद भी राजनीतिक एवं प्रशासनिक सहयोग से शराब
माफिया खुलकर शराब का व्यपार कर रहें है । नशाबंदी का कोई असर इन लोगों पर नही है ।
जिसका नतीजा है की मदपान करने वाले का सभी प्रकार का विकास बाधित हो रहा है । जिससे
समाज का भी विकास रुकता जाता है । जिस समाज मे नशापान करने वालों की संख्या जितना अधिक
रहता है । वह समाज उतना ही पिछड़ा हुआ बना रहता है । इन सभी बिंदुओं पर विचार करते जब
आगे बढ़ते हैं, तो यह साफ-साफ नजर आने लगता है, की शाश्वत जीवनशैली के लिए सबसे उपयुक्त
मार्ग तो बहुत पहले ही पूज्य बापू जी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रम में बता दिया है ।
गांधी जीने कुल 18 प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रम का जिक्र किया है – 1.सांप्रदायिक
एकता, 2.अस्पृश्यता निवारण, 3.नशाबंदी, 4.खादी, 5.ग्राम-उद्योग,6.सफाई अभियान, 7.बुनियादी
शिक्षा, 8.प्रौढ़ शिक्षा, 9.महिलाओं का उत्थान, 10.स्वास्थ्य एवं सफाई की शिक्षा, 11.प्रादेशिक
भाषाएं, 12.राष्ट्रीय भाषा, 13.आर्थिक समानता, 14. किसान, 15. मजदूर, 16. आदिवासी,
17. कुष्ठ रोग।, 18. विद्यार्थी,
19. नवाचार एवं उद्यमीता”( Innovation and entrepreneurship) ।
गांधी
जी ने अपनी दूरदर्शी विचार से इन अठारह रचनात्मक कार्यक्रमों का जिक्र किया है । जो
शाश्वत जीवनशैली के लिए कारगर एवं पर्याप्त है । किन्तु आज इन रचनात्मक कार्यक्रमों
में एक नए उन्नीसवाँ कार्यक्रम को जोड़ने की आवश्यकता है। वह है – “नवाचार एवं उद्यमीता”( Innovation and entrepreneurship) । आज देश ही नही विदेश
में भी कई उद्यमी अपने इनोवैशन एवं उद्यम के बलपर समाज में सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी
के साथ-साथ समग्र विकास की दिशा में गति प्रदान कर रहें हैं । जिससे समाज में सकारात्मक
विकास की दिशा में परिवर्तन हो रहा है । इस प्रकार यदि हम इन उन्नीस कार्यक्रमों को
धरातल स्तर पर उतारकर देखें तो हम शाश्वत जीवनशैली को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं
। आज आधुनिकता के पागल दौड़ से बाहर निकलकर सोचने की आवश्यकता है । शाश्वत जीवनशैली
मे समस्त प्राकृतिक घटक मौजूद हैं । इसलिए हमें अपने जीवनशैली को इन सभी प्राकृतिक
घटकों के अनुरूप बनाना होगा । जिसको बनाने के लिए हम इन उन्नीसों रचनात्मक कार्यक्रमों
का सहारा ले सकते हैं । आज प्रकृति में जितना असंतुल पैदा हो गया है। उसे दूर करने
का भी एक उपाय ही बचा है जिसके तरफ पूरा विश्व अपना नजर गड़ाए है वह है गांधी । विश्व
हमारे बापू को स्वीकार कर रहा है ।
धर्मेन्द्र भाई
युवा सामाजिक कार्यकर्ता
गाँव-सिवन
मो- 8115073618, 9471836040
ईमेल- dhamendra@yahoo.com

सूंदर
ReplyDeleteNice
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