छिनता बचपन,उलझता जीवन

     छिनता बचपन,उलझता जीवन

एक नवजात शिशु इस लोक में अवतरित होता है । इस लोक से बिलकुल अंजान एवं अनभिज्ञ होता है। पालन पोषण की सम्पूर्ण जिम्मेदारी परिवार अच्छे से निभाता है। धीरे धीरे उस नवजात की स्थिति प्रौढ़ होती है। इसके साथ ही उसके ऊपर सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी शिलशिला शुरू हो जाता है। इस कार्य में वह अपने को संलग्न करता है। जब उसे अपने शिक्षा प्राप्ति की बारी आती है तो उसकी भी स्वतंत्रता उसे नही प्राप्त होती है। हालांकि अनेकानेक जद्दोजहद के बाद भी वह अपने को कमजोर पाकर उसी पढ़ाई को करना शुरू करता है , जो परिवार के वरिष्ठ शताधारी या आलाधिकारियों ने निर्धारित किया है।

हम जिस समाज में रहते है, उस समाज के लोग बचपन में भी अपने बच्चे को एक स्वतंत्र बचपन व्यतीत करने की अनुमति नही देते है। प्रायः सभी परिवार के सदस्य उसे गुलामी की जंजीर में इस तरह जकड़ के रखते हैं कि बालक इनकार करने में पूरी तरह से असमर्थ होकर उसे स्वीकारता है। बचपन में जब स्कूल जाने की बारी आती है, तो न चाहते हुए भी बच्चा अपने पीठ पर अपने भार  का आधा से अधिक भार का बैग लेकर चलने को मजबूर होकर स्कूल जाता है। यदि बच्चा स्कूल जाने में थोड़ा भी आनाकानी करता है, तो सुबह सुबह डांट फटकार मिलना शुरु हो जाता है। अनगिनत प्रकार के ताने भी कसे जाते हैं। और यदि हद से ज्यादा हो गया, तो जेल के कैदी को जिस तरह छड़ी से पिटा जाता है, उसी तरह पिटाई भी पड़ने लगती है। अब अभी तक तो बच्चा अपना नींद भी नही पूरा किया था । तभी उसके उपर कहर ढा जाता है।  इस प्रकार के कुव्यवस्था को कोई और नही खुद बच्चे के माता पिता दे रहें है। इतना ही नही स्कूल के टीचर को भी कह आते है कि बहुत बदमाशी करता/करती है। इसको थोड़ा ध्यान से डांटा कीजिए।  अब ऐसे में बच्चा अपने मन की बात को न तो स्कूल के टीचर से कह पाता है और न ही अपने माता पिता से उसके सामने कोई अन्य विकल्प भी नही होता कि अपने इस प्रकार की मानसिक तनाव या व्यथा को साझा कर सके। अंततः बच्चा कुंठित होकर संघर्ष करता रहता है। आलम ए हुजूर कुछ ऐसा होता है कि उसके बचपना दिखाने का, बचपन की खिलखिलाती हंसी भी छीन ली जाती है। एक अबोध बालक जो कि अपने को खुश और आह्लादित करने के लिए तमाम तरह की खेल करता रहता है फिर भी उसका बचपन उससे कहीँ लम्बी दूर चली जाती है।
बालक अपने समय और अवस्था के साथ साथ बड़ा होता है। अब उसकी स्थिति ऐसी होती है कि वह निर्णय लेने में सक्षम होता है । जो कार्य वह सोचता है उसे करने की सम्पूर्ण क्षमता उसमें मौजूद होती है। लेकिन वह उसका उपयोग करने में बिलकुल अक्षम होता है। क्योंकि जिस समाज ने उसे पाल पोष कर बड़ा किया है, वह कभी उसे स्वीकार नहीं करता है। उस परिवार को जो शुरू से अपने सन्तान को गुलामी में रखने की जो आदत है उसे वे बदलने के लिए तैयार नहीं है। उनको इस बात की थोड़ी भी भनक नही होती है कि उसका बच्चा अब बड़ा हो गया है । वह अब अपना निर्णय खुद ले सकता है । जब बच्चा वयस्क हो जाता है, तो परिवार में एक और नई चीज की होड़ लगती है की पड़ोसी के बेटों को देखो कितने बड़े स्तर के नौकरी करते हैं । तुम उसके जैसा क्यों नही करते हो? इस प्रकार की तमाम उदाहरणों को अपने बच्चों के सामने परिवार के सदस्य प्रस्तुत करते फिरते हैं। इतना ही नहीं समय असमय डांट भी मिलती रहती है। अर्थात की हमारा समाज अपने सन्तान को एक अच्छा इंसान बनाने का कदापि प्रयत्न नही करता है, बल्कि उसे एक अच्छा नौकर बनाने का हर सम्भव प्रयास किया करता है।

आज जिस समाज में हम सभी रह रहे है, वहीं समाज सबसे ज्यादा अपने बेटे बेटियों को नौकर बनाने का पैरवी करता आ रहा है। रोज रोज माता पिता ही नही परिवार, पास-पड़ोस के अतिरिक्त उसके रिस्तेदारी के सदस्य भी उसे यहीं कहते फिरते है कि " क्यों जी कहीं नौकरी नही मिली क्या? जाओ कहीं भी कोई भी काम मीले उसको करते रहो। धीरे धीरे पैसा ज्यादा मिलेगा"। किसी को भी इस बात की थोड़ी भी जानकारी नही होती है कि उस लड़के या लड़की की कला,विशेषता क्या है? उसका रुचि क्या है? आखिर लड़का पढ़लिखकर बड़ा हुआ है तो वह करना क्या चाहता है? इतना ही नहीं जब बच्चा अपनी पढ़ाई पूर्ण करने के बाद जब घर आकर रहने लगे तो घर के लोगों को तो नहीं लेकिन रिस्तेदारी के लोगों को अवश्य बोझ लगने लगता है। जब कोई पूछता है कि क्यों जी पढ़ाई पूरी हो गयी आजकल क्या कर रहे हो? जवाब में जब लड़का कहता है कि घर पर हूँ तो पूछने वाला व्यक्ति कहता है कि" कितनी शर्म की बात है कि पढ़लिखकर घर पर बैठे हो, ये बात किसी को नही कहना " । अब ऐसे में लड़का या लड़की एक तनाव भरा समय अवश्य व्यतीत करने लगता है। लेकिन जहाँ तक हमने इस तरह के लोगों को समझा ये सिर्फ वहीं लोग होते है जिनका कोई लेना देना नही सिर्फ आपको उसी पागल दौड़ में ले जाने की चेष्टा करतें फिरते  हैं , जिस पागल दौड़ में वे अपने सन्तान को दौड़ाये होते है।

आजकल के जो माता पिता हैं, वे अपने बच्चे को उच्च शिक्षा की तरफ ध्यान आकर्षित नहीं करा  पा रहें है। कारण वे उसी पागल दौड़ कोच होते हैं, जो अन्य लोग होते हैं। आज गांव समाज हो या शहरी समाज सभी जगह परिवार की प्रतिष्ठा या शान शौकत को इस आधार पर देखा जाता है कि इस परिवार में उच्च स्तर के नौकरी करने वाले कितने लोग हैं। जिस परिवार में जितने उच्च स्तर के नौकर होंगे, उस परिवार को ज्यादा शिक्षित ,सभ्य और सम्मानित व्यक्ति माना जाता है। परिवार में जैसे हीं लड़का हो या लड़की 12 वीं पास करता है लोग उसे तमाम तरह के उदाहरण देकर नौकरी करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर देते हैं। अब ऐसी स्थिति में लोग अपने बच्चों का एड्मिसन किसी नजदीक के स्कूल , कॉलेज में कराकर उसे पढ़ने के लिए शहर में भेज देते है। जब वह बालक जो शहर से बिलकुल अनभिज्ञ और अंजान होता है। शहर में तो चला आता है लेकिन उसे शहर के चकाचौंध के बारे में तनिक भी कोई जानकारी नहीं होता है। इसी क्रम में उसके जीवन का वह सुनहरा समय निकलता जाता है । जिसमें उसे अपने व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहिए। यानी कि वह अपने कॉलेज के जीवन को हमेशा के लिए कॉलेज में छोड़कर शहर की चकाचौंध में लेकर चला जाता है। इस कारण लड़का /लड़की अपने उस संस्कार, संस्कृति , व्यवहार सभी चीजों का विकास कुशल तरीके से नही कर पाता है और न हीं अपना कुशल व्यक्तित्व निर्माण कर पाता है।इस कारण जो व्यक्ति बनकर वह लड़का या लड़की तैयार होता है वह पूरी तरह से व्यवहार अकुशल व्यक्ति होता है। उसे इस बात की भी जानकारी नही होती है कि अपने परिवार, समाज या खुद के प्रति क्या जिम्मेदारीयाँ हैं। उसे जरा भी ज्ञान नहीं होता है कि अपने बड़े लोगों से किस तरह व्यवहार करना चाहिए। इस प्रकार वह व्यक्ति एक साक्षर तो बन जाता है लेकिन शिक्षित नही हो पाता है। उसे कभी उस उच्च शिक्षा को ग्रहण करने का थोड़ा सा भी समय नही मिलता है कि वह अपना उत्तम व्यक्तित्व बनाए।

इसलिए आज के इस परिवर्तनशील आधुनिक विज्ञान के युग मे हर परिवार के सदस्य को इस बात का भलीभाँति ध्यान रखना चाहिए कि उनके बच्चे को खेलने कूदने, अपने बचपन जीने का पूरा अवसर प्राप्त हो। कभी बच्चों को इस बात के लिए दुखित न होना पड़े की उसको अपने मन की बात करने की आजादी नहीं है। जब बच्चों को जितना आजादी दी जाएगी बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास उतना ही अच्छा होगा।

अपने बच्चों में हर एक परिवार के सदस्य को इस बात की तलाश करनी चाहिए कि इसकी विशेषता क्या है? वह किस कार्य मे अपने को अव्वल दर्जे पर ले जाना चाहता है। जैसे कोई बालक खेलने में परिपूर्ण होता है तो कोइ गाने में तो कोई किसी अन्य कार्य में , जब उसे अपने पसंद के कार्य करने की आजादी मिलेगी तो वह अपने अभिभावक के बात को मर्यादित रूप से पालन करता है। वह अपने विकास के लिए उचित अवसरों को आसानी से चुनता है और खुद को विकसित करता जाता है। जब लड़का या लड़की अपने पढ़ाई के समय स्कूल कॉलेज जाता है तो उसे उठने , बैठने , समझने बात करने की शैली , व्यवहार , संस्कार  इत्यादि सभी चीजों को सीखता समझता है। और जब वह उच्च शिक्षा की प्राप्ति कर लेता है तो एक उत्तम स्तर का ब्यक्तित्व का निर्माण करता है। अपने को एक व्यवहारकुशल व्यक्ति के रूप में स्थापित करता है। इतना ही नहीं ये व्यक्ति अपने को उस तरह से तैयार करता है कि जिस समाज मे वह रहता है उस समाज का अच्छे से नेतृत्व भी कर सकता है।

-------धमेंद्र भाई

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