आधुनिक परिवार और बिगड़ता कल

"मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है" समाज के बिना व्यक्ति का जीवन बिताना सम्भव नही है। समाज का जन्म परिवार से होता है, परिवार का जन्म व्यक्तियों के समूह से होता है। एक गांव में समाज में बहुत सारे परिवार का समूह होता है। समाज की संरचना की बात करें तो समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार है। फिर आखिर परिवार कैसे बनता है ? कौन होते है परिवार में जिससे एक परिवार पूर्ण रूप धारण करता है? जब हम आरम्भिक समय की बात करें तब मानव कबीले के समूह में रहा करता था। उस समय कबीले में जितने भी सदस्य हुआ करते थे वे सभी परिवार के सदस्य होते थे । उनकी एक खास विशेषता भी थी "एकता, पारस्परिक निर्भरता, आपसी सहयोग और हम की भावना"। जब कभी भी कबीले के समूह पर कोई बाहरी आक्रमण होता तो सभी सदस्य एकता के साथ उसका सामना करते। उस समूह में जितने भी सदस्य होते थे वे सब एक दूसरे को अपनत्व की दृष्टि से देखते और रहते थे।

जब हम भारतीय ग्रामीण परिवार की बात करें तो परिवार की एक अलग स्वरूप दिखता है। प्रायः गांव में एक परिवार में माता-पिता, चाचा- चाची, दादा-दादी, भाई-बहन लगभग एक परिवार में 10 से ज्यादा ही लोग रहते थे। किसी किसी परिवार में 100 से भी ज्यादा सदस्य होते थे। घर में सभी मिलजुलकर रहा करते थे। सभी सदस्य एक-दूसरे की मदद के लिए हमेशा ततपर रहा करते थे। मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तो हमारे ही गांव में एक परिवार रहता था जिसमें लगभग सौ से एक सौ पचास सदस्य हुआ करते थे। परंतु आज वो परिवार टुकड़ो में बंट गया। उस बड़े समूहसदस्य वाले परिवार को संयुक्त परिवार कहा जाता है। आज परिवार ने कई रूप धारण किया हुआ है। जिसमें एकल परिवार, सूक्ष्म परिवार और अब जो नया उभरकर सामने आ रहा है वो है "नैनो परिवार"है। आज इस नैनो परिवार का जन्म इस आधुनिक समाज ने दिया है। जिसमें सिर्फ पति-पत्नी ही शामिल है। यदि बच्चा होता भी है तो उसको किसी आश्रय या चाइल्ड केअर होम में डाल दिया जाता है। इस तरह से परिवार का स्वरूप बदलता चला जा रहा है । इन परिवारों से निकलने वाले भविष्य की सोच , बर्ताव या व्यवहार बिलकुल अलग ही होता है। जो बच्चे एक परिवार के होते है वे सिर्फ उन्हीं को अपने परिवार का सदस्य मानते है जो हमेशा उनके इर्द गिर्द रहते हैं। और जब एकल या सूक्ष्म परिवार की तरफ देखें तो उनमे सिर्फ बच्चे और उसके माता पिता ही होते है। जिसके कारण बच्चा अपने माता पिता को ही अपने परिवार का सदस्य समझता है। इसका एक और पक्ष है कि बच्चा जिन सदस्यों का स्पर्श पाता है , जिससे अपनी सुरक्क्षा का अनुभव करता है ,अपने करीब पाता है जिससे वह उसे अपने ही परिवार का सदस्य का अनुभव करता है।

आज इस परिवारिक विघटन का दुष्परिणाम सम्पूर्ण समाज भोग रहा है। प्रायः समाज में "हम" की भावना पायी जाती थी जो आज के परिवार में बिलकुल विलुप्त होती नजर आ रही है। एक आदर्श परिवार में सदैव हम की भावना, आपसी सहयोग एवं सदभाव अवश्य पाया जाता है। आज के परिवार में प्रायः हम की भावना के जगह को "अहम" की भावना ने ले लिया है।  जिसके कारण परिवार टूटते और बिखरते चले जा रहे हैं। याद आता है कि जब हम छोटे थे किसी रिस्तेदारी या किसी की शादी में जाना होता था और जब हमारे कपड़े पुराने या गन्दे होते थे , तो जिसका कपड़ा या जुता नया होता होता था उसका खुशी-खुशी पहनकर चले जाते थे। इतना ही नही बड़े सदस्यों में भी यहीं होता था कि एक लोग अपने नाप का कपड़ा बनवाते थे और सभी सदस्य मौके मौके पर पहनकर जाया करते थे।  कोई सदस्य इसपर आपत्ति नहीं जताया करते। लेकिन आज का परिवार बिलकुल अलग थलग नजर आता है। आज परिवार में सभी सदस्यों के अपने अलग अलग कपड़े , जूते या कहें तो दैनिक उपयोग की सभी वस्तुएँ अलग अलग ही रहती है। जिसमें साफ साफ नजर आता है कि जिस परिवार में "हम" की बात होती थी आज उसकी जगह अब "मैं" और "मेरा" की बात होती है।

जब आधुनिक नैनो परिवार की तरफ देखें तो पता चलता है कि सिर्फ पति पत्नी ही है। ऐसे परिवार में कोई अन्य सदस्य जैसे कि माता पिता या अन्य का कोई स्थान नही होता है। बाद में ये सदस्य किसी नए सदस्य को जन्म तो देते है लेकिन कुछ ही दिनों में उसे भी किसी चाइल्ड केयर टेकर/होम में भर्ती कर देते है।  जो बच्चा होता है उसे न तो माता का  प्यार मिलता और न ही पिता का प्यार। ऐसे में बच्चा बिलकुल अलग तरह के व्यवहार वाला होता है। इस तरह के चाइल्ड केयर होम से निकलने वाले बच्चे को क्या पता कि परिवार क्या होता है, माता पिता का प्यार क्या होता है? बड़ा होने पर जब वह अपने घर आता है तो बिलकुल वह अपनी स्वतंत्रता के साथ रहना पसंद करता है। वह कभी नहीं चाहता कि जो वह काम कर रहा है चाहे वह गलत हो या सही कोई बाधा उत्पन्न करने की कोशिस करे, माता पिता ही क्यों न हो वह कभी पसन्द नही करता है।  यदि कोई सदस्य उसको मना करने का प्रयत्न करते हैं तो वह उनका कड़ा विरोध करता है। कभी कभी तो लड़ाई की भी नौबत आ जाती है। अंत में जब वो सारी चीजें बच्चे के बर्दास्त के बाहर हो जाती है तो वहीं किसी न किसी अपराध को जन्म देता है। जिसके कारण बच्चा न चाहते हुए भी अपराधी बनने को मजबूर होता है।

ऐसे में आवश्यकता है कि अपने बच्चे किसी चाइल्ड केयर होम या किसी अन्य दूसरे को पालने के बजाय अपने संरक्षण में बच्चे का लालन पालन करें। इससे बच्चे के अपराधी होने की प्रवृत्ति कम होगी। साथ ही बच्चा अपने परिवार को भी समझेगा और भविष्य में उसे भी किसी समाजिक और पारिवारिक वातावरण को बनाने में कठिनाई नही होगी।  जब बच्चा प्यार और सुरक्षा के अनुभव अपने माता पिता से करेगा तो वह अपनत्व और प्रेम का अनुभव करेगा । जिससे वह माता पिता के साथ घुलमिलकर अच्छे से रहेगा।
आज समाज का भयावह रूप देखने को मिलता है तो उसमें अहम योगदान परिवार का है। क्योंकि कहीं न कहिं परिवार भी जिम्मेदार है। लोग अपने को धनवान बनाने के लिए परिवार से अलग होकर भिन्न भिन्न क्षेत्रों में अलग अलग रहते है। हमारे समाज मे ऐसा कहा जाता था कि "परिवार ही धन है" लेकिन आज के समाज मानता है कि "धन ही परिवार है"  जो की  ठीक विपरीत होता नजर आ रहा है । आज संयुक्त परिवार होते हुए भी उसकी एक झलक भी नजर नहीं आती है। प्रायः घर में जब भी कोई नया कार्य करना होता था ,तो सभी सदस्य मिलजुलकर सर्वसम्मति से निर्णय लिया करते थे। आज के आधुनिक कालीन परिवारों में एकमति से निर्णय लिया जा रहा है।  वो एक मति वही है जो अपनी आर्थिक स्थिति को बाकी अन्य सदस्यों की तुलना में मजबूत है। अर्थात वह निर्णयकर्ता उस परिवार का धुरी है। 

आज समय और धनलोलुपता ने व्यक्ति को अपने जाल में इस तरह जकड़ा है कि वह अंधा हो गया है। उसको जनशक्ति का थोड़ा सा भी आभास नही है। धन के मद में मदमस्त व्यक्ति धनशक्ति के आगे जनशक्ति को समझना ही भूल गया है। आज लोग एकता की शक्ति और परिभाषा को बिलकुल ही भूल गए हैं।  एक छड़ी जब वह अकेले है तो तोड़ना कितना आसान होता है। लेकिन वही जब एक छड़ी कक समूह जिसमे कुछ छोटे, कुछ कमजोर और पतले होते है, फिर भी जब वे 10 से 15 की संख्या में एक साथ बंधे होते है तो कमजोर और पतला छड़ी भी नही टूटता है। क्योंकि वह सबके साथ एक सूत्र में बंधा होता है। जिसके कारण उसे तोड़ पाना मुश्किल होता है।  ठीक इसी तरह परिवार में भी होता है, कोई सदस्य आर्थिक रूप से मजबूत होता है तो कोई शर्म शक्ति से, कोई पढ़ाई लिखाई में अवल होता है तो कोई खेतों के काम मे पारंगत होता है। इस प्रकार सभी सदस्य मिलकर एकता के सूत्र में बंधकर रहते थे। जिसको कोई अन्य व्यक्ति चाहकर भी कुछ नही बिगड़ सकता था। क्योंकि परिवार में एकता होती थी।

आज भी समय कुछ खास नही बदला है, बदला है तो लोगों का रहन-शहन, सोचने समझने के तौर तरीके, लोहों को आज भी अपनी सर्वांगीण विकास करने के लिए परिवारिक एकता को कायम करना होगा। एकबार फिर से व्यक्ति को अपने अतीत की तरफ देखना होगा । जो संयुक्त परिवार रहता था उनको फिर से अपने गांव समाज में, शहरी समाज मे स्थापित करने की आवश्यकता है। 

                                           
                   लेखक- धमेंद्र भाई
             मोबाइल- 8115073618
       ईमेल- dhamendrau@yahoo.com

नोट- यह मेरा अपना व्यक्तिगत विचार है।
               

Comments

  1. Supper से भी ऊपर Brother

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  2. बोहोत ही सटीक लिखाण किया है भाई , बोहोत अच्छे ।

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