गजल

इक औरत, इक मर्द
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इक रोते मर्द की आँखें
समंदर सी होती है,
इक औरत की आँखों का
आँसू मोती होता है।

और मोती शायद समंदर के
आगोश में ही होता है।

इक हारता मर्द राजा होता है,
और हारते मर्द का साथ देती औरत
रानी।
ज़िन्दगी होती है शतरंज तब,
और रानी राजा को हारने नहीं
देती।

इक औरत का दिल कागज़
होता है,
मर्द का दिल होता है इक
कलम,

फिर लिखे जाते है किस्से
प्यार के,
जिन्हें पढता हर कोई है
पर मानता नहीं..

इक औरत का गुरुर मोम होता है
और बाती होती है मर्द का गुरुर,

फिर जलते है संग दोनों,
प्यार की रोशनी में
अनगिनत लड़ाइयों के बाद,

इक औरत का माथा
फूल होता है,
ओंस होता एक मर्द
होठ,

तब चूमता है ओंस
अपने फूल को..

जैसे आसमां की ओंस
बारिश बन धरती को
चूमती है।

इक औरत की हथेली
मरहम होती है
जो लगती है मर्द
के माथे पर,
इक मर्द की उंगुलियां
कंघा होती है,
जो सँवारते है
रानी की ज़ुल्फ़ें।

इक औरत का चले जाना उम्मीद का
जाना होता है,
इक मर्द की उम्मीद का जाना मर जाना
होता है।

इक मर्द का झुकना शगुन होता
है,
इक औरत का मुस्कुराना
मान जाना होता है..

.
इतना लुटा खुद में के बाज़ार बन गया,
ज़ख्म रिसता रहा और बेज़ार बन गया..

आंखों से झूठ बोल रहे थे वो सफेदपोश,
मैंने सच ही बोला मगर गुनहगार बन गया..

जिसके दिल में राज़ किया वही दिखा नहीं,
खुद के लफ़्ज़ों से ही खुद दीवार बन गया..

ज़िन्दगी पैदल गुज़ारी लेकिन उफ्फ न की ,
उसके शहर में पहुंचा तो बीमार बन गया..

हम मिलकर एक दिन उन पन्नों को समेटेंगे..
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मैं घर के इक कमरे में क़ैद हूँ,
लेकिन हज़ारों मील दूर,
उस शहर में तुम्हें अब भी देख सकता हूँ..
जिसे दिल की दिल्ली कहते है।।

हर सड़क, हर दुकान और वो फुटपाथ,
जहाँ प्यार करने वाले और पढ़ने वाले
अक्सर एक ही गिलास में पीया करते थे चाय
और शायद अब भी..

समय से तेज़ दौड़ती मेरी दिल्ली की
हज़ारों खूबसूरती है..
जिनमें से सबसे ऊपर तुम हो।।

मुझे याद है वो सड़के
जहाँ तुम्हारी हथेली को थामे मैं घूमा करता था..
बिलकुल बेख़ौफ़ हो कर..
प्यार से लबरेज़ मेरे उस चेहरे के रंग को
हज़ारों लोगों ने देखा..

ओह्ह.. वो मेट्रो स्टेशन कितना दिलकश होगा
आज भी..!
जहां सिगरेट पीते हुए मैं तुम्हारा इंतज़ार किया
करता था,
और खुद को उन बड़े से काले शीशों में देखा करता था,
तुम्हारे आने से पहले..

कितनी हज़ारों प्यार की दास्तानों को
देखा है उस मेट्रो स्टेशन ने..
जिसका नाम बदल गया!

तुमसे मिलने की बेचैनी इतनी,
के अगला "मेट्रो स्टेशन" सुनकर ही
मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो जाती
शायद उतनी जितनी की मेट्रो की रफ़्तार..

मैंने तुम्हें उर्दू लिखते हुए देखा है,
बिलकुल वैसे ही जैसे कि इमरोज़ अपनी अमृता को लिखते हुए देखते थे..

ओह्ह उर्दू से भी यदि मुझे इश्क हुआ
तो तुम ही उसकी बुनियाद में थी।

दुनिया ने पढ़े है मेरे इश्क के वो पन्ने,
जो उस लाइब्रेरी
के बाहर आज भी बिखरे हुए है..
इतिहास बनने की चाहत में..

हम मिलकर एक दिन उन पन्नों को
समेटेंगे..
बिलकुल वैसे ही
जैसे कि नमाज़ पढ़ते वक़्त,
तुम दुआएं में माँगती हो..

मैंने बुने है वो सपनें,
जो बनेंगे हमारी ज़िन्दगी के
आंखों का
काजल..

हमारी ख्वाहिशों को पहनाऊँगा मैं
हकीकत का इक लिबास..

ज़िन्दगी के तंग दिनों
पर लटकाऊंगा तेरे प्यार का एक
झुमका,

और ख़ुद भागती साँसों के पैरों पर
बाधूंगा तेरी पायल,

ताकि ज़िन्दगी मेरी
तेरी आँखों की माफ़िक सजे।

: ख्वाहिशें मेरा दामन ही नहीं छोड़ती,
तेरी उँगलियों पर अंगूठी बनके रहूँगा..

: इसबार भी ख़ामोश रहा वो मुझे देखकर,
मैं उसका ही एक उलझा सवाल हूँ..

: वक़्त ख़त्म न हो जाए कभी तेरे-मेरे दरमियां,
वरना हम दोनों की आँखे ईद में मुहर्रम सी लगेगी..

: तेरे आँखों की खामोशी हदों के दरमियां थी,
मेरी साँसों की तड़पन ख़्वाबों के दरमियां थी..

काजल आँखों का तेरे किनारों से बिखर गया,
किसी डूबते की ज़िंदगी साहिलों के दरमियां थी..

हम ख़ामोश रहे तब भी उस दौर में जिस वक्त,
आँखे तुझपर पर मेरी, बात दोस्तों के दरमियां थी..

मैं उस वक़्त फिर से जिंदा हो उठा था जब,
वो खूबसूरत अँगूठी तेरी उंगलियों के दरमियां थी..

यू तो नफ़रत ही ग़र तुझे पसंद तो नफ़रत ही कर,
पर किसी दौर में मोहब्बत मज़हबों के दरमियां थी..

: तुझे समंदरों का शौक था मुझे बह जाने का गुरुर,
तू बन आया आँसू और मैं काजल तेरा बन गया..

: तेरे दीदार की तलब में कई गलियाँ नापी,
इक तहज़ीब है इश्क में पागल होना..

: इश्क़ का किस्सा है आदतों की माफ़िक,
बिछड़ जाना कोई बरकतों की माफ़िक..

मेरी हथेली पर पड गए रंग तेरे नाखूनों के,
जैसे कोई निशान माथे का इबादतों के माफ़िक..

l: तू खामोश थी, ये तेरा अपना अंदाज़ था,
मैं तेरी आँखे पढ़ गया, ये मेरा मिज़ाज़ था..

: तुझे नफ़रतें मुबारक,
मुझे मोहब्बतें मुबारक..

तू अपने तेवरों में लड़,
मैं अपने अंदाज में हारूँगा..

: मोहब्बत भी जी भर थी, नफ़रतें भी गहरी थी मुझसे,
वो जब भी मिला उसका अंदाज़ कातिलों जैसा था..

: मुक़म्मल हो इश्क़ ये शर्त थी ही नहीं मेरी,
किस्तों पर खुदकुशी भी मेरा एक हुनर है..

ये लोग मुगालतों में जीते है इतना जान ले
दिल तेरा है जहां, धड़कन मेरी उधर है..

: वो खामोश रहा मगर सवालों में रहा,
मैं सवाल बन उसके उजालों में रहा..

उसे लगता था के साथ छोड़ गया मेरा,
नहीं जानता वो उम्रभर रिसालों में रहा..

तोड़ देगा मुझे इसका उसे यकीन है,
मैं जब भी रहा उसके ख्यालों में रहा..

हम खामोश थे जैसे सदियां हो बीच,
लब उसका ज़िंदा मेरे प्यालों में रहा..

नाखूनों को रंग वो सलीक़े से लगाता है,
ताउम्र मैं ज़िंदा इन रंग के उजालों में रहा..

: उसे ख़ुद पर गुरुर था,
मुझे अपनी पसंद पर नाज़..

मैंने उसका गुरुर रखा,
उसने मेरा मिज़ाज़..

: अँगारों के इन मंज़रों पे पानी लिख देंगे,
जो जी नहीं सकते वो जवानी लिख देंगे..

भागते हुए लम्हों का कोई कसूर ही न था,
जो छूट गया कहीं वो पेशानी लिख देंगे..

उसकी सांस उखड़ते ही अब हम भी उखड़ेंगे,
फिर जो पूछेगा हाल तो आसानी लिख देंगे..

डर लगा था तो खिड़की खोली इक रोज़,
हम ख़तों के अलफ़ाज़ों में वीरानी लिख देंगे..

पिछले बरस मिला तो हाल पूछा था उसने,
अबके बरस मिला तो कहानी लिख देंगे..

: बनके आँख रूह की तुमने जो क़ीमत चुकाई है,
शतरंज के तेरे सफेद खानों से मैंने मात खाई है..

है अभी कई मुकाम ज़िन्दगी की गलियों के दौर में,
तेरे वजूद को मेरा सज्दा है,तुम्हारी जो बात आई है..

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