ब्राम्हण कौन?

#ब्राम्हणमेरीनजरमें

हमारे फेसबुक पर बहुत से ब्राम्हण साथी जुड़े है जिसमे कुछ छोटे बालक मेरे गांव से भी है और पड़ोस के गांव के भी है जो अपनी अज्ञानता कहें या उनकी नासमझी अपने नाम के आगे ब्राम्हण लगाकर अपने साबित करना चाहते है कि हम ब्राम्हण हैं। जबकि असली मायने में पूछा जाय कि ब्राम्हण का मतलब क्या होता है तो शायद ही कोई बात पाए। उन्ही सभी उभरते नौजवान साथियों के लिए ब्राम्हण क्या होतें है इसपर आज लिखने के लिए मजबूर हो गया । क्योंकि शायद इनलोग को इस तरह के अज्ञानता में रखा जाए तो भविषय के लिए काफी नुकसानदेह हो सकता हैं।

#ब्राम्हण-     ब्राह्मण (आचार्य, विप्र, द्विज, द्विजोत्तम) यह वर्ण व्‍यवस्‍था का वर्ण है।  ब्राह्मण -ज्ञानी और आध्यात्मिकता के लिए उत्तरदायी होता है।अर्थात जो ज्ञानी होता है वो ब्राम्हण कहलाने के लायक होता है यदि वह वैदिक ज्ञान रखता हो ।
यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: -- ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर का ज्ञाता"।
ब्राह्मण नरम व्यवहार के होते है | ब्राह्मण व्यवहार का मुख्य स्रोत वेद हैं। ब्राह्मण समय के अनुसार अपने आप को बदलने में सक्षयम होते है। ब्राह्मणो का भारत की आज़ादी में भी बहुत योगदान रहा है जो इतिहास में गढा गया है। ब्राह्मणो के सभी सम्प्रदाय वेदों से प्रेरणा लेते हैं। पारंपरिक तौर पर यह विश्वास है कि वेद अपौरुषेय (किसी मानव/देवता ने नहीं लिखे) तथा अनादि हैं, बल्कि अनादि सत्य का प्राकट्य है जिनकी वैधता शाश्वत है। वेदों को श्रुति माना जाता है (श्रवण हेतु, जो मौखिक परंपरा का द्योतक है)।
ब्राह्मण का निर्धारण माता-पिता की जाती के आधार पर ही होने लगा है। स्कन्दपुराण में षोडशोपचार पूजन के अंतर्गत अष्टम उपचार में ब्रह्मा द्वारा नारद को यज्ञोपवीत के आध्यात्मिक अर्थ में बताया गया है,

जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते।
शापानुग्रहसामर्थ्यं तथा क्रोधः प्रसन्नता।
अतः आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञोपवीत के बिना जन्म से ब्राह्मण भी शुद्र के समान ही होता है।
ब्राह्मण मांस शराब का सेवन जो धर्म के विरुद्ध हो वो काम नहीं करते हैं। ब्राह्मण सनातन धर्म के नियमों का पालन करते हैं। जैसे वेदों का आज्ञापालन, यह विश्वास कि मोक्ष तथा अन्तिम सत्य की प्राप्ति के अनेक माध्यम हैं, यह कि ईश्वर एक है किन्तु उनके गुणगान तथा पूजन हेतु अनगिनत नाम तथा स्वरूप हैं जिनका कारण है हमारे अनुभव, संस्कॄति तथा भाषाओं में विविधताएं। ब्राह्मण सर्वेजनासुखिनो भवन्तु (सभी जन सुखी तथा समॄद्ध हों) एवं वसुधैव कुटुम्बकम (सारी वसुधा एक परिवार है) में विश्वास रखते हैं। सामान्यत: ब्राह्मण केवल शाकाहारी होते हैं।

जो मैने ऊपर लिखा है क्या इन सभी चीजों को अपने अंदर पातें है तो आप ब्राम्हण है अन्यथा आप एक शुद्र के समान है। ये मैं नही ब्राम्हण का आध्यत्म कहता हैं।

दोस्तों आज का युवाओ को इतना भ्रमित किया जा रहा है कि वे अपने संस्कारों को भी भूलते जा रहे हैं। आज जो लोग आपने को ब्राम्हण कहतें है उन सभी मे 99 प्रतिशत वहीं है जो अपने ही समाज के बेटी बहनों को जब गांव हो या शहर हो आते जाते सामने से गुजरते है तो भदी भदी कॉमेंट करते है , उस समय वे अपना ब्राम्हण धर्म भूल जाते है कि हम ब्राम्हण है। जब उनसे कोई बड़ा बात करता है तो उसको तमीज नही होता है कि बड़े से कैसे बात किया जाता है, हद तो तब हो जाती है जब अपने ही भाई को माँ बहनों की गाली देने लगते है , उस  समय उनकी ब्रम्हणत्व खत्म हो जाती है। जब किसी अन्य जाती की लड़कियों को देखते है तो ऐसा लगता है वो निम्न जाति की है, इतना ही नही उस निम्न जाति की लड़कियों को भी नही छोड़ते है और उनके ऊपर भी कॉमेंट छोड़ते है।
ब्राम्हण साथी कहते है कि हम ब्राम्हण है और झुकना नही जानते है , मूर्खों इतना पता होना चाहिए कि जब घर बनाया जाता था न उस समय घर की दरवाजा छोटे होते थे औ जो लोग झुक कर जाते थे उनको कभी चोट नही लगती थी और जो झुकना नही जानते थे उनको सर भी फोड़वाना पड़ता था। जबतक तुमलोग अपने अंदर ब्राम्हणों के संस्कार नही लाते तब तक किसी शुद्र से कम नही हो।
यदि तूमको अपने ब्राम्हण होने पर इतना ही गर्व है तो करो ब्राम्हणों जैसा परोपकार का काम, सबको इज़त देना सीखो, सबसे मृदुल भाषा मे बात करना सीखो अन्यथा अपने नाम के आगे ब्राम्हण लिखते रह जाओगे एक इंसान भी नही बना पाओगे।
मुझे गर्व इस बात का नही है कि मैं एक ब्राम्हण के घर मे पैदा हुआ हूँ, मुझे गर्व इस बात से है कि मैं एक इंसान हूँ। जितना प्यार स्नेह और  आदर तुम ब्राम्हणों कहने वालों के लिए उतना ही प्रेम मुझे अन्य सभी जातियों से है। यदि एक सभ्य समाज बनाने है तो अपने अंदर इस तरह घटिया समाज विभेदी विचारों को निकाल दो और सर्वधर्म समभाव की भावना से एक नए समाज की रचना करो। जबतक समाज के सभी वर्ग के लोगों का उत्थान नही होगा तब तुम अपना भी विकास नही कर सकते हो क्योंकि तुम भी उसी के वातावरण में रहते हो। इसलिए अभी भी समय है सुधार लो खुद को और ब्राम्हण से पहले एक अच्छा इंसान बनने का प्रयास करों, फिर ब्राम्हण अपने आप बन जाओगे। नाम मे ब्राम्हण दिखाने से ब्राम्हण नही हो बन जाओगे। ब्राम्हण बनना चाहते हो तो अपने चरित्र को उत्तम बनाओ, अपने ज्ञान को बढ़ाओ, अपने व्यवहार को और व्यक्तित्व को उत्तम बनाओ। लेकिन एक बार सबसे पहले इंसान बनो।

                      
                              धमेंद्र भाई
                 युवा गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता
          ईमेल- dhamendrau@yahoo.com

Comments

  1. आपके विचार उत्तम है परंतु मेरी समझ मे जो तात्कालिक समाज कि माँग को समझ ले जिससे समाज कि समरसता बनी रहे और उसके सारे अंग उचित रुप से कार्य कर सके किसी के साथ अन्याय जैसा कर्म ना हो समस्त ब्र्म्हान्ड़ मे शांति व प्रगति अनवरत कायम रहे इसी मार्ग का ज्ञान जिसने प्राप्त कर लिया और अपना योगदान कर रहा है ओ ब्राम्हण है !

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