मलयगिरि का गौरवगान
मलयगिरि का गौरवगान
वट वृक्ष की छाया में छोटे पौधों की वृद्धि कुंठित हो जाती है, क्योंकि उस छोटे पौधे को मिलने वाला पोषण वट वृक्ष ही ग्रहण कर लेता है। इस उदाहरण के द्वारा कहा जाता है कि बड़े लोगों के आश्रय में छोटे लोग पनप नही सकते।
परंतु बड़े लोग और महापुरुष में अंतर होता है। महापुरुष महत्वाकांक्षी हो पर स्वार्थी नही होतें है, वे महान हीं होते है । वे दूसरों का पोषण रखने वाले नहीं बल्कि दूसरों को पोषण प्रदान करने वाले होते है। उन्हें वात्सलय गाय की उपमा दी जा सकती है। गाय अपना दूध पिलाकर बछड़े को पालती-पोषती है, तभी बछड़ा प्रतिदिन बढ़ता जाता है। महापुरुषों की यहीँ आकांक्षा होती है कि उनके द्वारा सभी की उन्नति हो। दूसरों को ऊपर उठाने के लिए वे स्वयं नीचे झुकते हैं।
जिसके आश्रय में रहने वाले वृक्ष वैसे के वैसे रहते है, वह सुवर्णगिरि या रजतगिरी क्यों न हो उसका गौरव हम नही गाते ।हम तो गौरव-गान करते है,उस मलयगिरि का जिसके आश्रय में सामान्य वृक्ष भी चंदन बन जाता है।
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