जीवन

                 जीवन

पाणी आपने पाय , भलूं भोजन तो दीजे
आवी नमावे शीश, दण्डवत कोडे कीजे।
आपण घासे दाम, काम महोरोनूं करिए
आप उगारे प्राण , ते तणा दुःखमा मारिए।
गुण केडे तो गुण दश गणों ,मन,वाचा,कर्मे करी
अपगुण केडे जो गुण करे, तो जगमा जीत्यो सही।

( जो हमे पानी पिलाए, उसे हम अच्छा भोजन कराये। जो हमारे सामने सिर नवाए, उसे हम उमंग से दंडवत प्रणाम करे। जो हमारे लिए एक पैसा खर्च करे, उसका हम मुहरों की कीमत का काम कर दे। जो हमारे प्राण बचाये , उसका दुःख दूर करने के लिए हम अपने प्राणों तक न्योछावर कर दे। जो हमारी उपकार करे, उसका हमे मन, वचन और कर्म से दस गुना उपकार करना ही चाहिए। लेकिन जग में सच्चा और सार्थक जीना उसी का है, जो अपकार करने वाले के प्रति भी उपकार करता है।)

जीना इसी का नाम है।

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