असहयोग आंदोलन
असहयोग आंदोलन का महत्व
असहयोग आंदोलन यद्यपि अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हुआ तथापि ऐसा नहीं समझना चाहिए कि आंदोलन सफल हुआ ही नहीं। आंदोलन की सफलताएँ या महत्व को निम्नलिखित रूप में व्यक्त कर सकते हैं –
(1) असहयोग आंदोलन ने पहली बार देश की जनता को राजनीतिक मंच पर एकत्रित किया। आन्दोलन में किसान, मजदूर, दस्तकार, व्यापारी, व्यवसायी, कर्मचारी, पुरुष, महिलाएँ, बच्चे, बूढ़े आदि सभी प्रकार के लोगों ने भाग लिया जिससे यह वास्तव में एक जनांदोलन में परिवर्तित हो गया।
(2) आंदोलन ने देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक जनता को कांग्रेस के झंडे के नीचे संगठित किया।
(3) भारतवासियों में देश प्रेम, राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत हुई।
(4) आंदोलन ने लोगों में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम तथा स्वाभिमान की भावना का संचार किया।लोग स्वदेशी वस्त्रों को धारण करने लगे तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने लगे।
(5) आंदोलन से जनता में आत्मविश्वास, शक्ति, स्फूर्ति का प्रादुर्भाव हुआ।
(6) आन्दोलन में बड़े पैमाने पर मुसलमानों ने भी भाग लिया, मुसलमानों की भागीदारी ने आंदोलन को जनांदोलन का रूप दिया किंतु बाद में साम्प्रदायिकता का विकास होने पर हिंदू-मुस्लिम एकता बरकरार नहीं रह सकी।
जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि “गांधी के असहयोग आंदोलन ने आत्मनिर्भरता एवं अपनी शक्ति संचित करने का पाठ पढ़ाया। सुभाष चंद्र बोस ने भी स्वीकार किया कि गांधीजी ने कांग्रेस को एक सक्रिय संस्था के रूप में परिवर्तित किया।अब यह केवल कुछ पढ़े-लिखे लोगों की संस्था मात्र नहीं रही, बल्कि इसका पैगाम समाज के निचले से निचले हिस्से तक पहुँच गया।
4. संविनय अवज्ञा आंदोलन
राष्ट्रीय स्तर पर गांधीजी द्वारा चलाया गया दूसरा महत्वपूर्ण आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन था, इसे नमक सत्याग्रह आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन ऐसे समय में चलाया जब एक तरफ विश्व में आर्थिक मंदी आई हुई थी, तो दूसरी ओर पूर्व सोवियत संघ की समाजवादी सफलताओं ने तथा चीन में चल रहे क्रांति के प्रभाव ने विश्व के विभिन्न देशों में क्रांति की परिस्थिति पैदा कर दी थी। पूँजीवादी देशों में श्रमजीवी जनता समाजवादी क्रांति की तरफ और पराधीन देशों में आम जनता राष्ट्रीय मुक्ति स्वतंत्रता आंदोलन की ओर बढ़ रही थी। 1930 ई. के प्रारम्भ तक भारत में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उत्तेजना का वातावरण तीव्र गति से बढ़ रहा था। इस समय देश की राजनीतिक आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी। ऐसी स्थिति में गांधीजी पुन:कोई अहिंसक आंदोलन चलाने के लिए सोचने लगे। महीनों हृदय मंथन के बाद उन्हें एक रोशनी मिली और वह रोशनी थी “नमक सत्याग्रह”।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के उदय के कारण
सविनय अवज्ञा आंदोलन के उदय के अनेक प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कारण थे जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित थे-
(1) साइमन कमीशन के गठन में भारतीयों की अवहेलना
ब्रिटिश सरकार ने 1919 के अधिनियम को पारित करते समय यह कहा था कि वह दस वर्ष के पश्चात इन सुधारों की समीक्षा करेगी। परंतु नवम्बर 1927 ई. में ‘ब्रिटिश सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक सात सदस्यीय आयोग की नियुक्ति कर दी जिसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। इससे भारतीयों को घोर निराशा हुई। राष्ट्रवादी नेता यह प्रश्न करने लगे कि यह आयोग भारत के भावी संविधान के विषय में निश्चय कर सकता है, विशेषकर जब इसमें भारत का कोई भी प्रतिनिधि नहीं है। तेज बहादुर ने कहा कि “भारतीयों को इससे बाहर रखना, जान-बूझकर भारतीयों का अपमान करना है क्योंकि इससे भारतीयों को निम्न स्थान दिया गया है।"
(2) नेहरू रिपोर्ट की अस्वीकृति
लार्ड बर्केनहेड ने भारतीयों को यह चुनौती दी कि भारत के लोग स्वयं एक ऐसे विधान का निर्माण कर ब्रिटिश संसद के सामने प्रस्तुत करें, जिसको उन्होंने सर्वसम्मत्ति से तैयार किया हो। भारतीयों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। भारतीय संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्ति की गई। तेज बहादुरसप्रू, अली इमान,एम.एस.अणे,सरदार मंगल सिंह, श्वैब कुरेशी, जी. आर. प्रधान और सुभाष चंद्र बोस समिति के सदस्य नियुक्त हुए। समिति ने तीन महीने के कड़े परिश्रम के बाद एक स्मरणीय रिपोर्ट प्रस्तुत की। यह रिपोर्ट नेहरू रिपोर्ट के नाम से विख्यात हुई। रिपोर्ट में भारत की भावी शासन-व्यवस्था से संबंधित निम्नलिखित सुझाव दिए गए –
1. भारत को औपनिवेशिक स्वराज प्रदान किया जाना चाहिए और उसका स्थान ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत अन्य उपनिवेशों के समान होना चाहिए।
2. प्रांतों में भी केंद्र की भांति उत्तरदायी शासन व्यवस्था की स्थापना हो।
3.केंद्र में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना होनी चाहिए। भारत के गर्वनर जनरल को लोकप्रिय मंत्रियों के परामर्श पर तथा संवैधानिक प्रधान के रूप में कार्य करना चाहिए।
4.केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा द्विसदनीय हो और मंत्रिमण्डल उसके प्रति उत्तरदायी हो।निम्न सदन का निर्वाचन वयस्क मताधिकार पर प्रत्यक्ष पद्धति से हो और उच्च सदन का परोक्ष पद्धति से।
5.केंद्र और प्रान्तों के बीच शक्ति विभाजन किया जाये, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र को प्रदान की जायें।
6.साम्प्रदायिक निर्वाचन का अंत कर उसके स्थान पर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था का सुझाव दिया गया। साथ ही साथ यह भी सिफारिश की गई कि अल्पसंख्यक वर्गों को उनकी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण प्रदान किया जाये।
7.उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत को ब्रिटिश भारत के अन्य प्रांतों के समान वैधानिक स्तर प्राप्त होना चाहिए।
8. संविधान में मौलिक अधिकारों को भी शामिल करने को कहा गया।
9. सिन्ध को मुम्बई से अलग कर एक स्वतन्त्र प्रान्त बनाया जाये।
10. देशी रियासतों के अधिकारों तथा विशेषाधिकारों की रक्षा की व्यवस्था की जाये। देशी रियासतों को यह भी चेतावनी दी गई कि भारतीय शासन व्यवस्था में उन्हें तभी सम्मिलित किया जायेगा जब वह अपनी रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए तैयार हो जाएँगे।
नेहरू रिपोर्ट में कहा गया कि यदि 31 दिसम्बर 1928 तक सरकार ने इस रिपोर्ट को मंजूर नहीं किया तो कांग्रेस अपना अहिंसक असहयोग आंदोलन पुन: प्रारम्भ कर देगी तथा इस बार आंदोलन के कार्यक्रम में टैक्स न देना भी शामिल होगा।
(3) 1929-30 की आर्थिक मन्दी
1929-30 में विश्व में जो आर्थिक मंदी आई, उसका प्रभाव भारत में भी हुआ। विश्व की मंडियो में रूई के भाव गिर गए और इसका भारतीय निर्यात पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। मुम्बई की बहुत सी मिलें बंद हो गईं जिससे हजारों मजदूर बेकार हो गए। इससे कृषकों और मजदूरों में अशांति फैल गई। मुम्बई के कपड़ा उद्योग के श्रमिकों, कलकत्ता के पटसन के कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों तथा जमशेदपुर के लोहा तथा इस्पात के कारखानों में काम करने वाले श्रमिक साम्यवादियों के नेतृत्व में एकजुट होने लगे। कई व्यापार संघों की गतिविधियाँ भी जोर पकड़ने लगीं रेलों में हड़तालें हुई, और श्रमिक राजनीतिक रूप से जागृत हुए। दिसम्बर 1928 के कांग्रेस अधिवेशन में दस हजार से अधिक श्रमिक शामिल हुए जहां उन्होंने अपनी एकता प्रदर्शित की। 1928 ई. में गुजरात में बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में हुए बारदोली सत्याग्रह में ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली शांति के चिह्न उभर कर सामने आए।
(4) युवक वर्ग में अशांति
क्रांतिकारी आतंकवादी आंदोलन की पुन: उठती हुई लहर तथा छात्र संघों की बढ़ती हुई संख्याओं से उत्पन्न युवक अशांति भी अब स्पष्ट हो रही थी। लाहौर षडयंत्र केस के फलस्वरूप सरदार भगत सिंह, यतींद्र नाथ दास, राजगुरु, सुखदेव तथा अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया । 1928 और 1929 ई. में छात्रों के कई संगठन अस्तित्व में आए जैसे कि प्रांतीय युवक संघ तथा प्रांतीय छात्र संघ, जिनकी शाखाएँ पूरे बंगाल में फैल गई थी। इसी प्रकार महाराष्ट्र कांफ्रेंस ने जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में पूना में सम्मेलन किया। अक्टूबर 1929 ई. में मुम्बई प्रेजिडेंसी युवक कांग्रेस ने अपना सम्मेलन बुलाया। मदन मोहन मालवीय ने लाहौर में अखिल भारतीय दल कांफ्रेस का सम्मेलन बुलाया था। युवा वर्ग स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए उत्तेजित हो रहा था।
(5) 1929 का कांग्रेस अधिवेशन और पूर्ण स्वराज की मांग
दिसम्बर 1929ई. में लाहौर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ। इस बीच अपने रचनात्मक कार्यक्रमों को लेकर गांधीजी ने सारे देश का भ्रमण किया। इस दौरान वे आम लोगों के सम्पर्क में आए और उन्होंने कांग्रेस में नया उत्साह भर दिया। अधिवेशन ने नेहरू रिपोर्ट में घोषित औपनिवेशिक स्वराज के लक्ष्य को रद्द कर दिया तथा यह घोषित किया गया कि कांग्रेस का लक्ष्य पूर्ण स्वराज होगा। नेहरू ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि “आज हमारा लक्ष्य सिर्फ स्वाधीनता प्राप्त करना है। हमारे लिए स्वाधीनता है, पूर्ण स्वतंत्रता । 31 दिसम्बर 1929 ई. की आधी रात को रावी नदी के तट पर भारतीय स्वाधीनता का तिरंगा झंडा फहराया गया।
सन् 1929 की कांग्रेस द्वारा नियुक्त कार्य समिति ने जनवरी 1930 के शुरु में एक प्रस्ताव पास करके सभी प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों को 26 जनवरी को पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि जगह-जगह लोग एकत्रित होकर कांग्रेस का झंडा फहराएं और सर्वसम्मत प्रतिज्ञापत्र सामूहिक रूप से पढें।
(6) इंग़्लैंड में लेबर पार्टी की सरकार एवं दिल्ली घोषणा पत्र
इंग़्लैण्ड में सन् 1929 ई. में लेबर पार्टी की सरकार बनी, लेबर पार्टी की सरकार से भारतीयों को बहुत आशाएँ थीं कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री मैकडॉनेल्ड भारत को शीघ्र ही राष्ट्रमंडल में समानता का दर्जा दिए जाने की घोषणा करेंगे, किंतु 31 अक्टूबर 1929 ई. को गवर्नर लार्ड इरविन ने जो दिल्ली घोषणा की, उसमें भारत को औपनिवेशिक राज्य कब प्रदान किया जायेगा, इसकी कोई निश्चित तिथि नहीं बताई। इससे भारतीयों में घोर निराशा हुई थी।
अहिंसात्मक आंदोलन की प्रासंगिकता
भारत में बदलते परिवेश घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए गांधी इस परिणाम पर पहुँचे कि लोग स्वतंत्रता के लिए अधीर हो रहे हैं। यदि उन्हें नेतृत्व नहीं प्रदान किया जाता है तो किसी न किसी प्रकार की हिंसात्मक घटना घट सकती है। ऐसी स्थिति में उनका कर्तव्य है कि वह इस आंदोलन को अहिंसात्मक रूप प्रदान करे। गांधीजी के अनुसार केवल सविनय अवज्ञा ही देश को आने वाली अराजकता से बचा सकती थी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारी
कांग्रेस कार्यसमिति ने जब गांधीजी को सविनय अवज्ञा आंदोलन के संचालन की अनुमति दे दी, तो गांधीजी आंदोलन की प्रारम्भिक तैयारियों में जुट गए। गांधीजी ने वायसराय के सामने अपना ग्यारह सूत्रीय प्रस्ताव रखा और कहा कि यदि वह उनकी ग्यारह सूत्रीय मांगों को स्वीकार कर ले तो वे प्रस्तावित आंदोलन प्रारम्भ नहीं करेंगे। ग्यारह सूत्रीय मांगें इस प्रकार थीं –
1.नमक कर का अंत हो।
2.मदिरा का पूर्ण निषेध हो।
3. विदेशी वस्त्रों के आयात पर निषेध लगे।
4. विनिमय की दर में कमी कर उसे एक शिलिंग चार पौंड कर दिया जाये।
5. भूमि कर में कमी हो और उस पर कौंसिल का नियंत्रण रहे।
6. सेना सम्बन्धी व्यय में कम से कम 50 प्रतिशत की कमी की जाए।
7. सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया जाए, राजनीतिक मामले वापस ले लिए जाएं तथा निर्वासित भारतीयों को देश में वापस आने दिया जाए।
8. आत्मरक्षा के लिए हथियार रखने का लाइसेंस दिया जाए।
9. गुप्तचर पुलिस विभाग पर जनता का नियंत्रण रहे।
10. बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों का वेतन आधा कर दिया जाये,
11. भारतीय समुद्र तट कानूनी तौर पर केवल भारतीय जहाजों के लिए सुरक्षित रहे।
गांधीजी की इस घोषणा से सारे कांग्रेसजन आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि इन मांगों में कहीं भी स्वराज की बात नहीं की गई थी। इन मांगों पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता है कि इनमें अधिकांश मांगे राष्ट्रीय बूर्जुवा वर्ग की मांगे थीं। 25 फरवरी 1930 ई. में साबरमती में हुई कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक में एक बार पुन: आंदोलन का नेतृत्व करने और उनको चलाने के सारे अधिकार गांधीजी और उनके सहयोगियों के हाथों में सौंप दिया गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम थे-
(1) लोग नमक बनाएं तथा नमक कानून तोड़ें।
(2) महिलाएँ शराब, अफीम तथा विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दें।
(3) विद्यार्थी सरकारी स्कूल एवं कॉलेज त्याग दें।
(4) राजकीय कर्मचारी दफ्तरों को छोड़ दें।
(5) जनता सरकार को टैक्स न दे।
(6) जनता तकली और चरखा काते और सूत एकत्र करे।
(7) विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जाए।
(8) अस्पृश्यता का अंत हो।
आंदोलन का प्रारम्भ
वायसराय ने गांधीजी के पत्र का सहानुभूतिपूर्वक जवाब नहीं दिया। गांधीजी ने वायसराय के उत्तर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि “मैंने मांगी थी रोटी और मिले पत्थर” । गांधीजी ने योजनानुसार अपने 78 चुने हुए शिष्यों के साथ 12 मार्च 1930 को समुद्र के किनारे-किनारे डांडी यात्रा शुरू की।करीब 200 मील की पदयात्रा पूरी करके वे 5 अप्रैल को डांडी पहुँच गये। रास्ते में जनता ने गांधीजी का संदेश सुना जिससे प्रभावित होकर बहुत से लोग कांग्रेस के सदस्य बने, कई लोगों ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और गांधीजी के साथ हो लिए। जनता में जागृति पैदा करने और उसे आंदोलन में शामिल करने में डांडी यात्रा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 6 अप्रैल को गांधीजी ने समुद्र तट से थोड़ा सा नमक बनाकर नमक कानून भंग किया। यह एक संकेत था। उन्होंने मुट्ठी भर नमक बनाया था। यह आग की चिंगारी थी, उसकी लपटे सारे देश में फैल गईं। देश के विभिन्न भागों में लोगों ने स्वयं नमक बनाकर कानून का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया। सुभाष चंद्र बोस ने नमक सत्याग्रह या सविनय अवज्ञा अभियान की तुलना नेपोलियन के एलबा सेपेरिस की ओर किये जाने वाले अभियान से की थी।
नमक सत्याग्रह देश के कोने-कोने में फैल गया। छात्र स्कूल कॉलेज छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े। मजदूरों की हड़तालों और किसानों की लगानबंदी के आंदोलन ने, खासकर संयुक्त प्रांत में, जोर पकड़ा। मजदूरों और नौजवानों ने आम जनता के साथ मिलकर भारत को मुक्त कराने और समानांतर प्रशासन कायम करने का रास्ता अपनाया। लोगों का उत्साह दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था । किसानों के असंतोष का प्रत्यक्ष कारण आर्थिक संकट था। उन्हें फसलों की कीमत बहुत कम मिलती थी। कई प्रान्तों में करबंदी आंदोलन भी सफलता के साथ चलाया गया।
पश्चिम सीमा प्रांत में विद्रोह
उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खां के नेतृत्व में खुदाई खिदमतगार नमक स्वयं सेवक संगठन कायम किया गया । इन्हें लाल कुर्ती के नाम से भी जाना जाता है । लाल कुर्ती ने पठानों की राष्ट्रीय एकता का नारा बुलंद किया और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ आंदोलन संगठित किया। इसने श्रमजीवियों की हालत में सुधार की मांग की। कौमी आजादी के लिए खान अब्दुल गफ्फार खान ने कांग्रेस और गांधीजी के नेतृत्व को स्वीकार किया और पठानों के स्वभाव के विपरीत उन्हें, अहिंसा के रास्ते पर चलने की सलाह दी।
एक ओर जब अन्य प्रांतों में मुसलमान अपने आपको नमक सत्याग्रह आंदोलन से अलग रख रहे थे, उत्तर पश्चिम सीमा प्रीत के मुसलमानों ने बादशाह खान के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आंदोलन में जिन्ना के नेतृत्व वाले अल्पसंख्यक मुसलमानों ने भाग नहीं लिया।
सरकार का दमन चक्र और गांधीजी की गिरफ्तारी
सविनय अवज्ञा या नमक सत्याग्रह आंदोलन जैसे-जैसे तेज होता गया,सरकार का दमन चक्र भी तेज होता गया। आंदोलन को दबाने के लिए गवर्नर जनरल ने दर्जनों अध्यादेश जारी किए। जुलूसों और सार्वजनिक सभाओं को तितर-बितर करने के लिए अंधाधुंध लाठियां चलाई गईं। इसके साथ ही कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। जेल जाने वालों की संख़्या 1921-1922 के आंदोलन की तुलना में कम से कम तीन गुनी अधिक थी। सविनय अवज्ञा आंदोलन में पुलिस ने महिलाओं को भी नही छोड़ा। टैक्स न देने वालों की सम्पत्ति जब्त कर ली गई। इलाहाबाद की सड़क पर जवाहर लाल नेहरू की माँ स्वरूप रानी नेहरू को अंग्रेजों ने घोड़ों की टापों के नीचे कुचल दिया। इससे आंदोलन और तेज हुआ। गांधीजी ने सरकार द्वारा किए जा रहे घृणित एवं क्रूरतापूर्ण कार्रवाई की कड़ी निंदा की।उन्होंने सरकार से नमक कर समाप्त करने का अनुरोध किया, ऐसा नहीं करने पर धरसाना के नमक कारखाने, पर जनता का अधिकार करने का ऐलान कर दिया। 5 मई, 1930 को उन्हें गिरफ्तार करके यरवदा जेल भेज दिया गया। गांधीजी की गिरफ्तारी की उग्र प्रतिक्रिया हुई। अधिकांश शहरों में हड़ताले हुईं, सबसे उग्र प्रतिक्रिया धरसाना में हुई। श्रीमती सरोजनी नायडू और इमाम साहेब के नेतृत्व में स्वयंसेवकों को 21 मई को धरसाना नमक कारखाने पर धावा बोल दिया। श्रीमती नायडू ने सत्याग्रहियों से हिंसा पर न उतरने की अपील की। गिरफ्तारियों और पुलिस की मार के बावजूद कारखाने पर बार-बार धावा बोला गया।
प्रथम गोलमेज सम्मेलन
आंदोलन की बिगड़ती स्थिति को देखकर वायसराय ने घोषणा की कि अक्टूबर के अंत तक लंदन में गोलमेज सम्मेलन होगा। सप्रू जयकर समझौते के असफल होने के कारण कांग्रेस का रूख स्पष्ट हो गया था कि वह सम्मेलन में भाग नहीं लेगी। फिर भी 12 नवम्बर 1930 को रैमजे मैकडोनाल्ड की अध्यक्षता में सम्मेलन हुआ जिनमें 5 प्रतिनिधि ब्रिटिश भारत के थे। कांग्रेस ने सम्मेलन में अपना कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा।
गांधी-इरविन समझौता
प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। ब्रिटिश सरकार को यह बात समझ में आ गई कि बिना कांग्रेस के सहयोग के भारत की कोई समस्या का हल नहीं हो सकता। परिणामस्वरूप सरकार ने गांधीजी को एवं अन्य कांग्रेसी नेताओं को बिना शर्त रिहा कर दिया। सर तेज बहादुर सप्रू जयकर तथा श्रीनिवास शास्त्री के प्रयास से गांधी और इरविन के बीच 5 मार्च 1931 ई. को एक समझौता हुआ।
कांग्रेस के बहुमत ने गांधी-इरविन समझौते का स्वागत किया, परंतु वामपंथी नेताओं तथा युवकों ने इसका घोर विरोध किया। सुभाष चंद्र बोस ने इसे कांग्रेस की पराजय कहा। नेहरू जी को संरक्षण की व्यवस्था से बहुत दु:ख हुआ। गांधी जी, भगत सिंह, राजगुरू एवं सुखदेव को फांसी से नहीं बचा सके, जिससे युवकों को बड़ी निराशा हुई। कांग्रेस के कराची अधिवेशन में जो मार्च 1931 ई. में हुआ था, गांधी-इरविन समझौते का तीव्र विरोध हुआ था। कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए गांधीजी को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन से पहले लार्ड वेलिंगडन भारत के नये वायसराय नियुक्त हुए। उसने गांधी इरविन समझौते को भंग करना शुरू कर दिया। नाराज होकर गांधीजी ने वायसराय को तार भेजा। 1921 को शिमला में गांधीजी की वायसराय से भेंट हुई। वायसराय ने गांधीजी से अनुरोध किया कि वे शांति का मार्ग निकालने के लिए सम्मेलन में भाग लें।
द्वितीय गोलमेज सम्लेलन
गांधीजी कांग्रेस के एक मात्र प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए 29 अगस्त 1931 को लंदन रवाना हुए। दूसरा गोलमेज सम्मेलन 7 सितम्बर 1931 को प्रारम्भ हुआ।इसी बीच अक्टूबर महीने में इंग्लैंड में कॉमन सभा का आम चुनाव हुआ जिसमें अनुदार दल को पूर्ण सफलता मिली। इस बदली हुई परिस्थिति में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन एक दिखावा मात्र रह गया था। सरकार ने जानबूझ कर सम्मेलन में साम्प्रदायिक समस्या को बढ़ावा दिया।सम्मेलन में गांधीजी ने भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की। इसके साथ ही पूर्ण उत्तरदायी शासन तथा प्रतिरक्षा पर भारतीय नियंत्रण की मांग की किंतु ब्रिटिश सरकार ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया। वास्तविकता तो यह थी कि ब्रिटेन विश्व को यह दिखाना चाहता था कि वह भारतीय समस्या का हल चाहता है। किंतु भारतीय साम्प्रदायिकता के कारण किसी निष्कर्ष पर पहुँचना ही नहीं चाहते हैं। निराश होकर गांधीजी स्वदेश लौट आये।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति
28 दिसम्बर 1931 को गांधीजी लन्दन से भारत लौटे आये। उस समय फिरंगियों का दमन चक्र तीव्र गति से चल रहा था। लार्ड विलिंगडन गांधी-इरविन समझौते का उल्लन्घन कर रहा था। बंगाल मार्शल लॉ के नीचे कराह रहा था। सीमा प्रांत में लाल कुर्ती दल वालों को कुचला जा रहा था। जवाहरलाल नेहरू एवं शेखानी मुम्बई जाते समय गिरफ्तार कर लिए गए। गांधीजी गवर्नर जनरल से बात करना चाह रहे थे किंतु इसकी अनुमति नहीं मिली। इसी समय कांग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित किया कि यदि सरकार अपना रुख बदलने को तैयार हो तो कांग्रेस उसके साथ सहयोग करने को तैयार है अन्यथा सविनय अवज्ञा आंदोलन पुन: शुरू करना पड़ेगा। कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें गांधीजी भी शामिल थे। फलस्वरूप आंदोलन पुन: शुरू हो गया। सरकार ने कांग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया। समाचार पत्रों पर कठोर नियंत्रण लगा दिया गया। ब्रिटिश सैनिकों द्वारा मार-पीट,लाठी वर्षा, सामूहिक दंड आदि आम बात हो गई थी। विलिंगटन का यह दावा भ्रमपूर्ण साबित हुआ कि वह आंदोलन को 6 सप्ताह के भीतर कुचल देगा। सरकार के कठोर दमन के बावजूद आंदोलन की गति शिथिल नहीं हुई। विदेशी माल के बहिष्कार का प्रचार पहले से अधिक हुआ।
16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधान मंत्री रैम्जेमैक डोनेल्ड’ ने साम्प्रदायिक निर्णय की घोषणा की। घोषणा के द्वारा हरिजनों को हिन्दुओं से अलग करने की कोशिश की गई थी। साथ ही मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों तथा एंग्लो इंडियन के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई थी। साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध गांधीजी ने 20 सितम्बर 1932 से आमरण अनशन की घोषणा की तथा पूना समझौता (26 सितम्बर 1932)के बाद ही अनशन समाप्त किया।
17 नवम्बर 1932 से 24 दिसम्बर 1932 तक लंदन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन हुआ। कांग्रेस का कोई भी प्रतिनिधि इसमें भाग नहीं लिया। तीसरा गोलमेज सम्मेलन भी असफल रहा।
पूना समझौता के बाद गांधीजी ने यरवदा जेल में आत्मशुद्धि और हरिजन उद्धार के लिए 21 दिनों के उपवास का निर्णय लिया। 8 मई 1933 को उन्होंने उपवास प्रारम्भ किया, और सरकार ने उसी दिन उन्हें जेल से छोड़ दिया। जेल से छूटकर गांधीजी ने 6 सप्ताह के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन बंद कर दिया तथा सरकार से राजनीतिक बंदियों को छोड़ने की अपील की किंतु सरकार ने बंदियों को नहीं छोड़ा। गांधीजी ने 14 जुलाई 1933 को सविनय अवज्ञा बंद कर व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया।जनता के उत्साह में बहुत कमी आई, फलत: 7 अप्रैल 1934को गांधीजी ने इसे भी बंद कर दिया।मई 1934 में कांग्रेस कार्यकारिणी परिषद की बैठक में आंदोलन को बन्द करने की घोषणा की गई।
आंदोलन का महत्व
सविनय अवज्ञा आंदोलन यद्यपि पूर्ण स्वराज प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया गया था किंतु यह उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सका, फिर भी राष्ट्रीय आंदोलन में सविनय अवज्ञा आंदोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। एक अंग्रेज समाचार पत्र के संवाददाता ने आंदोलन की खिल्ली उड़ाई और कहा था कि “क्या एक सम्राट को एक केतली में पानी उबालने से हराया जा सकता है। ब्रिटिश सरकार इस आंदोलन के नैतिक प्रभाव को आँकने में असफल रही थी। ब्रिटिश भारत का ऐसा कोई प्रांत नहीं बचा था जहाँ इस आंदोलन का असर न पड़ा हो।
असहयोग आंदोलन की तुलना में इस आंदोलन को मजदूरों, किसानों तथा महिलाओंका अप्रत्याशित योगदान प्राप्त हुआ था। आंदोलन से ब्रिटिश सरकार को स्पष्ट हो गया था कि भारतीय राजनीति में कांग्रेस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सांविधानिक सुधार करते समय इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती।
सविनय अवज्ञा आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को बहुत बुरी तरह झकझोर दिया। आंदोलन के दौरान राष्ट्र जाग उठा था, जनता में राष्ट्रप्रेम की भावना प्रबल हुई थी। आन्दोलन ने जनता में राष्ट्रीय एकता, आत्मविश्वास , गौरव तथा देश की आजादी के लिए नया जोश, नया उत्साह भरा ।
5. भारत छोड़ो आंदोलन
गांधीजी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद का रक्तहीन अंत कर एक नए युग की आकांक्षा रखी थी। देश में व्याप्त हताशा, निराशा से गांधीजी चिंतित हुए और वे जनता में पुन: राष्ट्रीय आंदोलन की गति बढ़ाने पर मंथन करने लगे। गांधीजी ने हरिजन में लिखा कि “भारत को ईश्वर के भरोसे छोड़ कर चले जाओ और यदि यह अधिक हो तो उसे अराजकता की स्थिति में छोड़ दो” । 1942 ई. में गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन चलाया। उन्होंने उद्घोष किया – “अंग्रेजों भारत छोड़ो” । आन्दोलन चलाए जाने के कारण गांधीजी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन चलाने के निम्नलिखित कारण थे –
(1) क्रिप्स मिशन की असफलता – क्रिप्स मिशन की असफलता से यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेजों का लक्ष्य भारत को स्वतंत्र करने का नहीं है। विश्व जनमत को अपने पक्ष में लाने के लिए अंग्रेजों ने इस नाटकीय स्वांग का प्रदर्शन किया था। प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक लास्की ने भी स्पष्ट रूप से लिखा था कि चर्चिल की सरकार ने सर स्टेफर्ड क्रिप्स को भारत की समस्या का हल करने के लिए सच्चे इरादे से नहीं भेजा था।असली विचार भारत को स्वाधीनता देना नहीं, बल्कि मित्र राष्ट्रों की आँखों में धूल झोंकना था।
(2) जापान के आक्रमण का भय - द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान की सेना निरंतर आगे बढ़ रही थी इससे भारतीय प्रदेशों को भी खतरा उत्पन्न हो गया था। गांधीजी ने यह अनुभव किया कि हम भारत की सुरक्षा तभी कर सकते हैं जब अंग्रेज भारत छोड़ देंगे। उनका कहना था कि “अंग्रेंजों, भारत को जापान के लिए मत छोड़ो। भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप में छोड़ जाओ” ।
ब्रिटिश सरकार जापान की सेनाओं का मुकाबला करने में असफल रही। मलाया, सिंगापुर, तथा बर्मा में अंग्रेजों की पराजय हुई, भारतीयों को विश्वास हो गया कि ब्रिटेन भारत की रक्षा नहीं कर सकते ।
3. आर्थिक असंतोष – देश की असंतोषजनक आर्थिक स्थिति ने भी महात्मा गांधी को भारत छोड़ो आंदोलन चलाने के लिए बाध्य किया।देश में महँगाई बहुत तेजी से बढ़ रही थी, जिससे आम जनता का जीवन दूभर हो गया था। देश की दयनीय स्थिति के लिए गांधीजी ने अंग्रेज सरकार को जिम्मेदार माना।
4. बर्मा में भारतीयों के साथ भेदभाव – बर्मा में रह रहे भारतीयों के साथ अंग्रेज दुर्व्यवहार करते थे।बर्मा से आने वाले भारतीय शरणार्थियों के साथ पशुवत व्यवहार किया जा रहा था।उनको पृथक तथा कष्टदायक रास्ते दिए गए थे। गांधीजी ने 1942 में लिखा था, “भारतीय और यूरोपीय शरणार्थियों के व्यवहार में जो भेद किया जा रहा है और सेनाओं का जो बुरा व्यवहार है उससे अंग्रेजों के इरादों और घोषणाओं की तरफ अविश्वास बढ़ रहा है” ।
5. पूर्वी बंगाल में आतंक का राज्य – पूर्वी बंगाल में बहुत से लोगों को बिना मुआवजा दिए उनकी जमीनों से वंचित किया गया।सेना के लिए किसानों के घर जबरदस्ती खाली करवाए गए, जिससे भारतीयों में असंतोष फैला।
6. अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण – देश का तत्कालीन वातावरण अंग्रेजों के विरुद्ध था। 27 जुलाई, 1942 को अंग्रेजी सरकार ने लंदन के एक ब्राडकास्ट में यह घोषित किया कि भारत को युद्ध का आधार बनाया जायेगा और इसके लिए सभी सम्भव एवं आवश्यक कारवाई की जाएगी। इससे अंग्रेजों का ध्येय और स्पष्ट हो गया। ऐसी स्थिति में कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ आरम्भ करने का निश्चय किया।
27 अप्रैल 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक इलाहाबाद में हुई। उस बैठक में सरकारी नीतियों की आलोचना की गई, और वर्तमान परिस्थितियों में युद्ध में इंग्लैंड की सहायता नहीं करने की बात की गई। गांधीजी ने कहा कि भारत की समस्या का एक मात्र निदान अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन में है क्योंकि ब्रिटेन भारत की रक्षा करने में असमर्थ है। यदि जापान भारत पर आक्रमण करता है तो उसका सामना भी अहिंसात्मक तरीके से किया जायेगा।
कांग्रेस का वर्धा प्रस्ताव – जुलाई 1942 ई. में वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। बैठक में गांधी के विचारों का समर्थन किया गया और एक प्रस्ताव द्वारा अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग की गई। इस प्रकार वर्धा प्रस्ताव में यह स्पष्ट कर दिया गया कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत में अपने साम्राज्य का अंत कर दे तो कांग्रेस ब्रिटिश सरकार एवं मित्र राष्ट्रों को उनके युद्ध प्रयत्न में सहयोग देगी। इसके विपरीत यदि ब्रिटेन भारत को स्वतंत्र करने के लिए तैयार नहीं हुआ तो गांधी के नेतृत्व में स्वराज प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक संघर्ष प्रारम्भ कर दिया जाएगा।
भारत छोड़ो प्रस्ताव – 7 अगस्त, 1942 को मुम्बई में कांग्रेस का अधिवेशन प्रारम्भ हुआ।महात्मा गांधी ने समिति के समक्ष 8 अगस्त को भारत छोड़ो का अपना ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया। उस प्रस्ताव में कहा गया कि भारत में ब्रिटिश शासन का तात्कालिक अंत मित्र राष्ट्रों के आदर्शों की पूर्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसी पर युद्ध का भविष्य, स्वतंत्रता तथा प्रजातंत्र की सफलता निर्भर है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने पूरे आग्रह के साथ ब्रिटिश सत्ता को हटा लिए जाने की मांग की है। कांग्रेस के इसी अधिवेशन में महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद किया तथा देश को करो या मरो का संदेश दिया। महात्मा गान्धी ने 140 मिनट के अपने लम्बे भाषण में कहा, “मैं फौरन आजादी चाहता हूँ, आज रात को ही, कल सवेरे से पहले आजादी चाहता हूँ।" महात्मा गांधी के उस भाषण पर टिप्पणी करते हुए इंद्र विद्यावाचस्पति ने लिखा है कि “गांधी उस रात ऐसे बोल रहे थे, मानो उनकी अंतरात्मा से भगवान बोल रहा हो” । पट्टाभि सीता रमैय्या ने भी कहा है कि “गांधीजी उस दिन एक अवतार एवं पैगम्बर की प्रेरक शक्ति से प्रेरित होकर बोल रहे थे। उनके अंदर ज्वाला धधक रही थी। गांधीजी मानवता, विश्वव्यापी भ्रातृत्व, शांति एवं मानव मात्र के प्रति सद्भाव से प्रेरित होकर विश्वलोक की चर्चा कर रहे थे”।
गांधीजी ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में 13 सूत्रीय कार्यक्रम रखे -
1.सारे देश में हड़ताल शांतिपूर्वक चलाई जाए। यह गांधीजी तथा कांग्रेस के अन्य नेताओं को बंदी बनाए जाने के विरोध में होगी।
2.सभी गाँवों तथा शहरों में कांग्रेस का भारत छोड़ो संदेश पहुँचाने के लिए सभाएँ होगीं।
3.नमक हमारे जीवन की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसके बनाने पर किसी भी प्रकार की रोक का भारतीय विरोध करेंगे।
4.देश भर में अहिंसात्मक तथा असहयोग आंदोलन चलाना है।
5.विद्यार्थी देश की स्वतंत्रता के लिए स्कूल, कॉलेजों को छोड़कर असहयोग आंदोलन शुरू करेंगे। नेताओं के बंदी बनाये जाने पर उनका स्थान विद्यार्थी लेंगे।
6.सरकारी कर्मचारी नौकरी छोड़ दें। जो त्यागपत्र नहीं देना चाहते, वे सरकारी आज्ञा का उल्लंघन करेंगे।
7.सेना का प्रत्येक फौजी अपने को पहले कांग्रेसी समझे तथा ऐसे सभी आदेशों का उल्लंघन करे जो उसकी आत्मा को कष्ट पहुँचाये।
8.भारत की देशी रियासतों के राजा-महाराजाओं को भी स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना चाहिए।
9.स्त्रियों को अहिंसात्मक आंदोलन में भाग लेने पर जोर दिया जाये।
10.प्रत्येक स्त्री और पुरुष ‘करो या मरो’ का नारा अपने जीवन का उद्देश्य बना ले। इससे प्रत्येक व्यक्ति में स्वतंत्रता या इसके संघर्ष में बलिदान देने की भावना प्रबल हो जाएगी।
11.सभी हिंदू, मुसलमान, सिख, पारसी तथा ईसाई इस आंदोलन के भाग हैं।
12. गांधीजी के बंदी बनाये जाने के बाद प्रत्येक भारतीय स्वयं आंदोलन का नेतृत्व करें।
13. लोग चरखा चलायें। इससे स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती प्रदान होगी।
नेताओं की गिरफ्तारी
8 अगस्त के प्रस्ताव और गांधीजी के भाषण से स्पष्ट था कि कांग्रेस आजादी प्राप्ति के लिए आंदोलन करने को कटिबद्ध थी। 8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पास हुआ। 9 अगस्त को महात्मा गांधी सहित सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी को आगा खाँ महल में कैद रखा गया और अन्य नेताओं को अहमदनगर किले में ले जाया गया। गिरफ्तारी की बात गुप्त रखी गयी। देश भर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया।
आन्दोलन का प्रारम्भ
अपने प्रिय नेताओं की गिरफ्तारी का समाचार सुन जनता अधीर हो उठी। कांग्रेस को गैर कानूनी संगठन घोषित किया गया। सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी से तथा सरकार की दमन नीति ने जनता में विद्रोह की भावना पैदा कर दी। जनता ने सरकार की नीति के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। जगह-जगह पर आवागमन के साधनों को तोड़-फोड़ दिया गया। रेलवे और पुलिस थानों को जला दिया गया। छात्रों, दुकानदारों, मजदूरों, और गृहणियों ने सड़को और गलियों में जुलूस निकाला। गांधीजी की जय, गांधी को छोड़ दो और अंग्रेजों भारत छोड़ों के नारों से आकाश गूँज उठा।सरकार ने शांतिपूर्ण जुलूस पर लगी चार्ज किया। एक लाख से अधिक आंदोलनकारी जेल में बंद कर दिए गए। पुरुषों को बड़ी बेरहमी से मारा गया और औरतों की इज्जत लूटी गई। लोगों की सम्पत्ति नष्ट हो गई।
माइकोल ब्रेचर के अनुसार , सरकार का दमन चक्र बहुत कठोर था और क्रांति को दबाने के लिए पुलिस राज्य की स्थापना की गई थी। सरकार के अमानुषिक दमन चक्र ने आंदोलन को दबा तो दिया, किंतु छिपे रूप से आंदोलन चलता रहा जिसका नेतृत्व अरूणा आसफ अली,राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने किया।
महात्मा गांधी का अनशन
जनता के हिंसात्मक कार्यों और सरकारी दमन से गांधीजी का हृदय चीत्कार उठा। अत: उन्होने आत्म शुद्धि के लिए उपवास शुरू किया। तेरह दिन के बाद गांधीजी की हालत दयनीय हो गई । सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। किंतु गांधीजी ने सफलतापूर्वक उपवास समाप्त किया। 6 मई, 1944 को गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया गया।
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