आत्मज्ञान जीवन का वरदान

                           
आत्मज्ञान

बड़ा शरीर होने से आदमी बड़ा नहीं होता, शरीर छोटा होने से छोटा नहीं होता। बड़े से बड़ा जो सृष्टि का मूल तत्व है उसमे बुद्धि लगाने से व्यास विशाल बुद्धि होती है, 
"नमस्ते व्यासविशाल बुद्धेः उदारविंदा। 
यत्पत्र येनत्वया भारत ततजालिको ज्ञानमय।।"

बुद्धि में ज्ञान का दिया जलाने से विशाल बुद्धि होती है। तुच्छ चीजों को पाकर जो सुखी होते हैं वो तो बालक-बुद्धि है, बच्चों के आगे खिलौने, चाकलेट, लोलीपाप रखो और सच्चे हीरे रखो तो बच्चे खिलौनों में राजी हो जायेंगे और हीरे छोड़ देंगे। ऐसे ही संसार है, जो छोड़ के मरना है उसके पीछे मरे जा रहे हैं और जिसको पाकर मौत भी शरणागत हो जाती है, ऐसे आत्मदेव को छोड़ देते हैं। 
श्रुति भगवती कहती है :~
“आत्मलाभात परमलाभम न विद्यते, आतमसुखातपरमसुखम। 
न विद्यते, आतमज्ञानात परमज्ञानम न विद्यते।।” 

आत्म-ज्ञान से बड़ा कोई लाभ नहीं, आत्म-सुख से बड़ा कोई सुख नहीं, आत्म-ज्ञान से बड़ा कोई ज्ञान नहीं। सदा के लिए ये दीनता, हीनता मिटाने की ताकत आत्म-ज्ञान में है। सदा समाहित चित करने का सामर्थ्य आत्म-ज्ञान में है। धर्म करें, अर्थ कमायें, कामना भोगें लेकिन मुक्तिदायी ज्ञान से अगर वंचित हैं तो जीवन व्यर्थ हो जाता है। धन्यभागी वो हैं जिनको आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार में संपन्न हुये महापुरुष मिल गए। महान सिकंदर भी गलती करके अभागा रह गया लेकिन शबरी भीलन उससे महान निकली, मतंग गुरु के चरणों में बैठ गयी तो बैठ गयी। धन्ना जाट, रैदास चर्मकार महान आत्मा बन गये, गुरु के ज्ञान को पाकर तृप्त हो गये परमात्म-ज्ञान, परमात्म-लाभ, परमात्म-शान्ति को पा लिया तो सन्तोष जागृति हो गया। खूब धन कमा लो, खूब तीर्थ कर लो, खूब यात्रायें कर लो, लेकिन दो क्षण का सत्संग इससे ज्यादा पुण्य-प्रदायक है। सपने में आपने खूब यात्रा की, खूब धन कमाया, खूब दान किया और खूब हेंकड़ी आ गई कि मुझे स्वर्ग मिलेगा, मेरा तो जयघोष होगा.....लेकिन ये सपने का ख्याली पुलाव है, आँख खुली तो वही ठनठनपाल।

“उमा कहौं मैं अनुभव अपना।
सत् हरि भजन जगत सब सपना।।” 

ये जगत सपने जैसा है, देखने को सच्चा लगता है इसी में उलझ उलझ के लोग मर जाते हैं। 

“पानी केरा बुलबुला अस मानस की जात।
देखत ही छिप जात है ज्यों तारा परभात।।” 

आज-तक जो जो उपलब्धियाँ हुई सब ख्याली पुलाव...आज तक जो आपने जाना है जो पाया है और जो जानेंगे जो पाएँगे, मृत्यु के एक झटके में छूट जायेगा, फिर भी जो नहीं छूटता वो कौन है ? उसकी तरफ आना ही आत्म-ज्ञान है, उसमें शान्ति और सामर्थ्य पाना ही आत्म-लाभ है, उसमें तृप्ति, आत्मरस पाना आत्मसुख है। बहुत आसान तरीका है और बहुत ऊंची चीज है।

                       धमेंद्र भाई
            युवा सामाजिक कार्यकर्ता
              मो. 8115073618

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