मन की पांच अवस्थाएँ

मन की इन पांच अवस्थायें
क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरू

मन एक है, उसकी पाँच अवस्थायें हैं।इनके नाम ‘योग-दर्शन’ के व्यास-भाष्य में लिखे हैं। मन की पहली अवस्था का नाम है- क्षिप्त। दूसरी का नाम है- मूढ़। तीसरी का नाम है- विक्षिप्त। चौथी का नाम है- एकाग्र। पाँचवी अवस्था का नाम है- निरू

ये अवस्थाएं  समय-समय पर ऑटोमेटिक रूप से मौसम के कारण, खान-पान आदि परिस्थितियों के कारण, घटनाओं के कारण और कुछ हमारे अपने विचारों से बदलती रहती हैं। इसलिए हमको सावधानी से प्रयोग करना है और अच्छी से अच्छी अवस्था बना के रखनी है।

1. क्षिप्त अवस्था :- मन की पहली अवस्था है- क्षिप्त अवस्था। क्षिप्त का अर्थ है-मन की चंचल स्थिति, चंचल अवस्था। मन की जब चंचल अवस्था होती है,तो उसे  क्षिप्त-अवस्था कहते हैं। हम मन में जल्दी-जल्दी विचारों को बदलते रहते हैं। आप पांच मिनिट बैठिये। मन में देखिए, आप फटाफट पचास विचार उठा लेंगे। वहाँ जाना है, यह करना है, उसको यह बोलना, उससे यह लेना है, उसको वो देना है, ये खरीदना है, वो काम करना है, अभी यह कर लूँ, यह खा लूँ, फिर वहाँ सो जाऊँ, फिर यूँ बात कर लूँ। फटाफट विचार बदलते रहना मन की ‘क्षिप्त-अवस्था’ है।  क्षिप्त अवस्था में रजोगुण की प्रधानता होती है। चंचल-अवस्था में व्यक्ति जल्दी-जल्दी मन में विचार बदलता है, वो जल्दी-जल्दी स्मृतियाँ उठाता है। कभी इसको याद किया, कभी उसको याद किया, कभी और चीज याद किया।

2. मूढ़ अवस्था – दूसरी अवस्था है-मूढ़ अवस्था। जब तमोगुण का प्रभाव अधिक होता है, तब मूढ़ अवस्था उत्पन्न होती है। मूर्च्छा जैसी, थोड़ी नशीली, नशे जैसी अवस्था या तमोगुणी अवस्था मूढ़़ता प्रधान अवस्था है। जैसे-थोड़ी नींद सी आ रही है, झटके आ रहे हैं, आलस्य आ रहा है। या कोई शराब पी लेता है तो नशे की स्थिति हो जाती है। ये सारी मूढ़-अवस्था कहलाती है। उस समय व्यक्ति का मन पूरा स्वस्थ नहीं होता। बुद्धि काम नहीं करती, समझ नहीं आता है, उसको पता नहीं चलता, कि क्या करना, क्या नहीं करना। इस तरह की जो स्थिति है, उसको ‘मूढ़-अवस्था’ कहते हैं।

3. विक्षिप्त अवस्था- फिर तीसरी है- विक्षिप्त अवस्था। विक्षिप्त अवस्था में सत्त्वगुण प्रभावशील होता है, सत्त्व गुण प्रधान होता है। लेकिन बीच-बीच में रजोगुण और तमोगुण स्थिति को बिगाड़ते रहते हैं। जैसे कोई व्यक्ति ध्यान में दो-चार मिनट बैठा, उसका मन ठीक लगा। उसका मन थोड़ा-थोड़ा टिकने लगता है, फिर किसी कारण से वो ध्यान टूट जाता है, इसलिए उसकी एकाग्रता बिगड़ जाती है। इसको बोलते हैं-‘विक्षिप्त अवस्था’। दो-चार मिनट बाद उसने फिर कोई वृत्ति उठा ली और वो स्थिति बिगड़ गई। इस बिगड़ी हुई अवस्था का नाम है- विक्षिप्त। विक्षिप्त का अर्थ ‘बिगड़ा हुआ’ होता है। इस तरह रजोगुण के कारण ध्यान की अवस्था जब बिगड़ती है, मन की शांत-स्थिर अवस्था जब बिगड़ती है, तब उसका नाम है- ‘विक्षिप्त अवस्था’।

4. एकाग्र अवस्था- फिर चौथी है- एकाग्र अवस्था। जिसमें पूरा सत्त्वगुण का प्रभाव होता है। अब रज और तम पूरे चुपचाप बैठ गए, ठंडे हो गए। अब वो बीच में गड़बड़ नहीं कर सकते। मन के ऊपर आत्मा का पूरा प्रभाव है, पूरा कंट्रोल है, पूरा नियंत्रण है। ‘एकाग्र-अवस्था’ का मतलब है, कि मन अब पूरा नियंत्रण में आ गया, पूरा अधिकार में आ गया। मन अब हमारी इच्छा के विरुद्ध कहीं इधर-उधर नहीं जाता। जैसे पहले लगता था, कि हम विचार उठाना नहीं चाहते, फिर भी आ जाते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होता है। अब तो हम जो चाहते हैं, वही विचार लाते हैं। इस अवस्था का नाम है-‘एकाग्र -अवस्था’।  अब ”दिल है, कि मानता नहीं” वाली शिकायत खत्म हो गई।
दिल है कि मानता नहीं, वो क्षिप्त अवस्था थी। और अब दिल पूरा मान लेता है, सौ प्रतिशत कंट्रोल में आ जाता है। इस अवस्था का नाम है- एकाग्र अवस्था। यानि अब सत्त्वगुण प्रबल है। व्यक्ति का मन के ऊपर वैसा ही कंट्रोल है, जैसा कार वाले का कार के ऊपर है। ऐसा ही आत्मा का मन के ऊपर जब पूरा कंट्रोल होता है, तो वो ‘एकाग्र-अवस्था’ है।  इस अवस्था में जीवात्मा को समाधि में अपने आत्मस्वरूप की अनुभूति होती है और सूक्ष्म प्राकृतिक तत्त्वों की भी अनुभूति होती है। इस चौथी अवस्था में प्राकृतिक तत्त्वों और आत्मा, इन दो चीजों का अनुभव होता है। इसका नाम एकाग्र अवस्था। इस अवस्था में एक समाधि होती है, उसको बोलते हैं-‘संप्रज्ञात- समाधि’ ।

5. निरू(-अवस्था :-मन की पाँचवी अवस्था है- निरू( अवस्था। यह एकाग्र अवस्था से भी और ऊंची अवस्था है। इसमें भी मन पर पूरा नियंत्रण होता है। इसमें भी एकाग्र की तरह से ही मन पर पूरा कंट्रोल है तो एकाग्र में और निरू( में अंतर क्या है? अंतर इतना है, एकाग्र अवस्था में प्राकृतिक तत्त्वों और जीवात्मा, इन दो चीजों की अनुभूति होती है। लेकिन इस अवस्था में समाधि का विषय बदल जाता है। असंप्रज्ञात समाधि यानी निरू( अवस्था में ‘ईश्वर’ का अनुभव होता है। जब ईश्वर की अनुभूति होती है, उस अवस्था का नाम है- निरू अवस्था। और उस समय जो समाधि होती है, उसका नाम है- ‘असंप्रज्ञात-समाधि’।

इस तरह से मन की ये पांच अवस्थाऐं हैं। इनमें से चौथी और पांचवी एकाग्र और निरू, इन दो अवस्थाओं में समाधि होती है, बाकी तीन में समाधि नहीं है। क्षिप्त और मूढ़ अवस्था तो खराब ही है। उनसे अच्छी तो है विक्षिप्त अवस्था। और इससे अच्छी है चौथी- एकाग्र अवस्था। और सबसे अच्छी है- निरू अवस्था। योगाभ्यास में यही करना है। ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ अर्थात् मन के विचारों को रोको। जैसे-जैसे रोकते जाएंगे, वैसे-वैसे हमारी स्थिति ऊँची-ऊँची होती जाएगी। जैसे-जैसे थोड़े-थोड़े विचार रुकेंगे, तो विक्षिप्त अवस्था आ जाएगी और जब पूरे विचार रोक देंगे तो समाधि शुरू हो जाएगी अर्थात एकाग्र अवस्था आ जाएगी। फिर ईश्वर की अनुभूति हो जाएगी, तो निरू अवस्था आएगी। इस तरह से मन को समझनी चाहिए। मन एक ही है, दो तीन नहीं।

Comments

  1. Very nicely explained. Wonder how the word Vikshipt is explained the way here. Vyutpatti ke saat bataye. Vikshipt= ardh ekagrata ?

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  2. बहुत बढ़िया जानकारी दी है आपने...

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