विकास या विनाश

           विकाश कर रहे हैं या विनाश

आज पृथ्वी की स्थिति लगभग ख़तरे की सूचना दे रही है। मनुष्य ने स्वयं प्रकृति में असंतुलन पैदा कर ऐसा खतरा उत्पन किया है।
मनुष्य ने अपने सुख के लिए पृथ्वी के उपयोगी भागों के दोहन किया, जैसे- जैसे  मनुष्य प्रगति कर रहा है , वैसे -वैसे उसने स्थान - विशेष के वातावारण को अपने अनुकूल बनाने की चेष्टा की और प्रगति पथ पर बढ़ने का प्रयास किया। वातावरण का तात्पर्य उस विशेष चारो तरफ के आवरण से है , जिसमें उस स्थान- विशेष या क्षेत्र - विशेष की वायु अर्थात  "वात" रहती है। इस प्रकार के वातावरण को अपने वश मे करते हुए मनुष्य जब निरंतर प्रगति करता रहा है तो उसने धरती से ऊपर और धरती से नीचे तक के क्षेत्र को अपनी प्रगति का माध्यम बना डाला । इसीलिए आज इस आधुनिक युग में रहने वाले लोग बड़े गर्व से कहते है कि " दूसरे महायुद्ध के बाद हमारे इस उपग्रह में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। स्वर्ग के जिन सुखों की हमारे पूर्वजो ने कल्पना तक नहीं की थी। उनको हम धरती पर उतार लाने में सफल हुए हैं  । " परंतु सचाई यह है कि जिस तेजी से हमने भौतिक उन्नति की है , दूसरी ओर ध्यान से देखें तो हमने अपने जिंदा रहने के आवश्यक तत्व - शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, उपजाऊ मिटी आदि के सर्वोत्तम गुण खो दीये है। आज की भोगवादी सभ्यता ने मनुष्य को प्रकृति का दुश्मन बना दिया है। अपने क्षणिक सुख के साधन जुटाने के लिए मनुष्य ने प्रकृति के साथ क्रूर अत्याचार किया है । अन्न उत्पन करने के लिए वनों का सफाया किया। अपनी विलासिता की वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक वनों को काट डाला । प्राकृतिक वन और वनष्पतियों जो जीवन की प्राणदायिनी गैसों को देती थी , वे नष्ट हो गयीं। प्राकृतिक वन आदि के न रहने से  बाढ़ , सूखा , भूस्खलन और रेगिस्तानों के विस्तार कि गति मनुष्य की प्रगति से भी तेज होने लगी । वायुमंडल में कार्बन -डाई - ऑक्साइड और दूसरी विषाक्त गैसों का दूषित प्रभाव स्पष्ट दिखायी देने लगा है। सूर्य से मनुष्य मात्र की रक्षा करने वाली " ओजोन " की रक्षक छतरी में भी छेद होने लगे हैं , जिसके कारण मनुष्य मात्र का जीवन खतरे में पड़ गया है। ऐसी विषम स्थिति आ जाने से पृथ्वी के भोगवादी निवाशियों ने अब सोचना प्रारंभ किया है कि यह क्या हो रहा है? पृथ्वी के ऊपर होने वाले परिवर्तनों ने अब सम्पूर्ण मानव को चेतावनी दे दी है कि यदि समय रहते पृथ्वी के संतुलन को नही संभाला गया तो एकदिन ऐसा भी आएगा जब यह पृथ्वी रहने योग्य नही रहेगी और जीव- जंतु , वनस्पतियों से लेकर मनुष्य समाज हमेशा -हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। क्योंकि यह खतरा अब वातावरण का न रहकर पर्यावरण का खतरा हो गया है, प्रकृति का खतरा बन गया है साथ ही सम्पूर्ण मानव का जीवन खतरे में आ गया है। वातावरण तो किसी स्थान व क्षेत्र के चारो ओर के आवरण को कहते है , परंतु यह खतरा तो किसी स्थान या क्षेत्र के सम्पूर्ण अस्तित्व का खतरा बन गया है। सम्पूर्ण अस्तित्व से हमारा तात्पर्य है किसी स्थान , क्षेत्र , व अंचल - विशेष की दसों दिशाओं में उत्पन्न होने वाले खतरे से है, और इस प्रकार का खतरा सम्पूर्ण विश्व मे प्राकृतिक असंतुलन के कारण भयंकर रूप ले चुका है । इसीलिए सम्पूर्ण विश्व "पर्यावरण " के इस संकट से चिंतित हो गया है।
     आज जिस तरह से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं , समस्याओं , जरूरतों  इत्यादि के पूर्ति करने के लिए जंगलों, पेड़ो , वनष्पतिओं इत्यादि को अपने धुन में पागल होकर दिन - प्रतिदिन नष्ट करते जा रहा है , यदि यह रावण रूपी मानव अपनी इन न भरने वाली आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं को नियंत्रित नही किया तो एकदिन ऐसा आएगा जब हर एक मनुष्य के साथ - साथ सम्पूर्ण जीव - जगत  पशु - पक्षी भी अपना अस्तित्व को खो बैठेंगे और यह धरती जीव विहीन होकर रह जाएगी।

       D K UPADHYAY
    SOCAIL WORKER
     MO. 8115073618
EMAIL- DHAMENDRAUPADHYAY924@GMAIL.COM

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Comments

  1. बढ़िया है। प्रयास करते रहो । सुधार की बहुत संभावनाएं हैं।

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