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Showing posts from December, 2019

कोयले का टुकड़ा

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                         कोयले का टुकड़ा   अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बड़ा आज्ञाकारी और मेहनती छात्र था। लेकिन जब से उसने कॉलेज में दाखिला लिया था उसका व्यवहार बदलने लगा था। अब ना तो वो पहले की तरह मेहनत करता और ना ही अपने माँ-बाप की सुनता। यहाँ तक कि वो घर वालों से झूठ बोल कर पैसे भी लेने लगा था। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि अमित बुरी संगति में पड़ गया है। कॉलेज में उसके कुछ ऐसे मित्र बन गए हैं जो फिजूलखर्ची करने, सिनेमा देखने और धूम्र-पान करने के आदी हैं। पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढाई- लिखाई पर ध्यान देने को कहा ; पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता, उसका बस एक ही जवाब होता, ” मुझे अच्छे-बुरे की समझ है, मैं भले ही ऐसे लड़कों के साथ रहता हूँ पर मुझ पर उनका कोई असर नहीं होता … “ दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे-धीरे परीक्षा के दिन आ गए, अमित ने परीक्षा से ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वो पर्याप्त नहीं थी, वह एक विषय म...

वैश्या का उद्धार

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.                          "वैश्या का उद्धार” एक वैश्या थी। उसके मन में विचार आया कि मेरा कल्याण कैसे हो ? अपने कल्याण के लिए वह साधुओं के पास गई, उन्होंने कहा कि तुम साधुओं का संग करो, साधु त्यागी होते हैं, इसलिए उनकी सेवा करो तो कल्याण होगा।           फिर वह ब्राह्मणों के पास गई तो, उन्होंने कहा कि साधु तो बनावटी हैं, पर हम जन्म से ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण सबका गुरु होता है। अतः तुम ब्राह्मणों की सेवा करोगी तो कल्याण होगा।           इसके बाद वह सन्यासियों के पास गई तो उन्होंने कहा कि सन्यासी सब वर्णों का गुरु होता है। इसलिए उनकी सेवा करने से कल्याण होगा। फिर वह वैरागियों के पास गई तो उन्होंने कहा कि वैरागी सबसे तेज होता है अतः उनकी सेवा करो तो कल्याण होगा।           फिर वह अलग-अलग संप्रदायों के गुरुओं के पास गई तो, उन्होंने कहा कि हम सबसे ऊंचे हैं शेष सब पाखंडी हैं। तुम हमारी चेली बन जाओ। हमारे से मंत्र ले लो तब हम वह बात बताएँगे जिससे त...

कांच की बरनी और दो कप चाय

काँच की बरनी और दो प्याला चाय  जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, काँच की बरनी और दो कप चाय हमें याद आती है।  दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाये हुए एक काँच की बड़ी बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद के लिए  जगह नहीं बची...  उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई? हाँ... आवाज आई...फिर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकड़ उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकड़ उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये ।फिर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फिर हाँ.. कहा । अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अप...